Bahurupiya Art Folk Culture: ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट: किशनगंज जिले के ठाकुरगंज नगर क्षेत्र की व्यस्त मुख्य सड़कों पर सोमवार को एक बेहद दुर्लभ और मनमोहक दृश्य देखने को मिला. आधुनिकता की चकाचौंध के बीच अचानक बाजार में सदियों पुरानी बहरूपिया (भेष बदलने वाली) लोक संस्कृति जीवंत हो उठी. बाजार में एक ओर हाथ में विशाल गदा थामे, चेहरे पर डरावना डार्क मेकअप किए और अपनी भारी गूंजती आवाज में कड़कदार संवाद बोलता चर्चित खलनायक “क्रूर सिंह” लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा, तो दूसरी ओर “लैला-मजनू” के युगल रूप में सजे कलाकारों ने अमर प्रेम कथा की खूबसूरत और सजीव झलक पेश की.
राहगीर बनाने लगे वीडियो, कलाकारों के पीछे दौड़े बच्चे
रंग-बिरंगे पारंपरिक वस्त्र, चेहरे पर गाढ़ा और जीवंत श्रृंगार, अभिनय का अनूठा लोक अंदाज और नाटकीय संवाद अदायगी ने राह चलते व्यापारियों और खरीदारों को कुछ पलों के लिए रुकने पर विवश कर दिया. बाजार में इस दृश्य को देख कई लोग अपने जेब से मोबाइल निकालकर वीडियो और रील्स बनाने लगे, जबकि छोटे-छोटे बच्चे कौतूहलवश इन अनोखे कलाकारों के पीछे-पीछे दौड़ते और तालियां बजाते दिखाई दिए.
कलाकारों का परिचय:
सांस्कृतिक राज्य राजस्थान की वीर भूमि से चलकर ठाकुरगंज पहुंचे इन मंझे हुए कलाकारों में सांगानेर के रहने वाले अरविन्द ने “लैला-मजनू” का दोहरा रूप धरकर लोगों को मंत्रमुग्ध किया, जबकि प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मेहंदीपुर बालाजी के निवासी मनोज 90 के दशक के चर्चित टीवी धारावाहिक के मुख्य खलनायक “क्रूर सिंह” के कालजयी किरदार में सजे नजर आए. दोनों कलाकारों की बेजोड़ संवाद शैली ने पूरे ठाकुरगंज बाजार को एक जीवंत रंगमंच में तब्दील कर दिया.
कभी उत्सव हुआ करता था बहरूपियों का आना, अब मोबाइल ने छीनी चमक
अतीत और वर्तमान का दर्द: कलाकारों ने बीते दिनों को याद करते हुए बताया कि एक जमाना था जब ग्रामीण इलाकों या छोटे कस्बों में बहरूपियों के आने की भनक लगते ही पूरे गांव के चौक-चौराहों पर भारी भीड़ जमा हो जाती थी. लोग अपने सारे काम छोड़कर घंटों बैठकर उनका अभिनय देखते थे. बहरूपिये केवल शुद्ध मनोरंजन का साधन नहीं थे, बल्कि वे ग्रामीण समाज के लोक उत्सवों और सांस्कृतिक पहचान के मुख्य आधार माने जाते थे.
लेकिन बदलते वक्त के साथ जबसे हर हाथ में मोबाइल और इंटरनेट आया है, तबसे लोगों का नजरिया बदल गया है. कलाकार अरविन्द बताते हैं, “आजकल लोग हमारे अभिनय की बारीकियों को नहीं देखते, वे बस कुछ सेकेंड का वीडियो या रील बनाकर सोशल मीडिया पर व्यूज पाने के लिए आगे बढ़ जाते हैं. पहले लोग हमसे संवाद करते थे, चरित्र की गहराई को समझते थे और पूरे मान-सम्मान के साथ अनाज और राशि दान करते थे.”
खलनायक का रूप धरे मनोज ने कहा कि वे इस किरदार के जरिए नई पीढ़ी को पुराने दौर की याद दिला रहे हैं, लेकिन अब यह कला सम्मान और जीविका का मजबूत जरिया नहीं रह गई है.
राजा-महाराजाओं के दौर में “उमरयार” कहलाते थे ये कलाकार
बहरूपिया कला का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है. पुराने समय में राजाओं-महाराजाओं के राजदरबारों में इन कलाकारों को न केवल विशेष दरबारी दर्जा प्राप्त था, बल्कि राजकीय संरक्षण भी मिलता था. भेष बदलने की इस अद्भुत और अचूक कला के कारण कई बार इन कलाकारों का उपयोग रियासतें और साम्राज्य अपने दुश्मन राज्यों से गुप्त व सामरिक सूचनाएं जुटाने (गुप्तचरी) के लिए भी करती थीं. उस ऐतिहासिक दौर में बहरूपिया समाज को “उमरयार” (भेष बदलने में माहिर) के नाम से पुकारा जाता था और समाज में उनकी एक अत्यंत सम्मानित प्रतिष्ठा होती थी.
कौमी एकता और धार्मिक सौहार्द की सबसे अनूठी मिसाल
इस लोक कला की सबसे बड़ी और अटूट विशेषता इसकी अंतर्निहित सामाजिक और धार्मिक समरसता है. इस कला में मजहब की कोई दीवार नहीं होती; कई बार हिंदू कलाकार बेहद आदर के साथ मुस्लिम फकीर, सूफी संत या मुगल बादशाह का रूप धारण करते हैं, तो वहीं मुस्लिम समाज से आने वाले कलाकार भगवान शिव, देवर्षि नारद, हनुमान या अन्य पौराणिक धार्मिक पात्रों की भूमिका पूरी श्रद्धा से निभाते हैं. यही कारण है कि यह कला सदियों से भारत की गंगा-जमुनी तहजीब, आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकता का सबसे मजबूत प्रतीक रही है.
घोर आर्थिक तंगी के कारण नई पीढ़ी बना रही है दूरी
बेहद कम आमदनी, समाज में घटते कद्रदानों और सरकारी उपेक्षा के कारण इस बहरूपिया समाज की नई पीढ़ी अब इस पुश्तैनी पेशे से तेजी से दूरी बना रही है. कलाकारों ने रुंधे गले से बताया कि उनके बच्चे अब पेट पालने के लिए मजदूरी और अन्य छोटे-मोटे रोजगार तलाशने को मजबूर हैं.
ठाकुरगंज की तपती धूप में अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे इन कलाकारों ने सरकार और सांस्कृतिक मंत्रालयों से गुहार लगाई है कि यदि समय रहते इस दम तोड़ती लोक कला को कोई मासिक पेंशन या सरकारी मंचों (महोत्सवों) पर स्थान देकर संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में भारत की यह सदियों पुरानी और खूबसूरत बहरूपिया परंपरा पूरी तरह से इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी.
