किशनगंज.ऐसा माना जाना है कि नदियों के बगैर किसी सभ्यता का सृजन नही हो सकता.नदियां जीवन दायनी है,नदियां आस्था की धारा है,लेकिन अब ये सब बातें सिर्फ सुनने और कहने मात्र की है.क्योंकि नदियों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है.जिले के सीमावर्ती दिघलबैंक प्रखंड में बहने वाली कनकई और बूढ़ी कनकई की धारा रेगिस्तान में बदल चुकी है.गाद और गंदगी ने इन नदियों को मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया है.लिहाजा हर साल अपने साथ जल प्रलय लाने वाली नदियां बरसात खत्म होते ही और अब गर्मी की शुरुआत में ही मरणासन्न स्थिति में पहुंच गयी है.नेपाल सीमा से सटे होने के कारण दिघलबैंक प्रखंड में नदियां अपने साथ जल का भरपूर भंडार लेकर आती थी.लेकिन बीते कुछ सालों में नदियों की गहराई ही समाप्त हो गयी है. लिहाजा नदियों में जल ठहरता ही नही है,केवल बाढ़ और बरसात के मौसम में ही कुछ माह के लिए इन नदियों में जल दिखता है.बारिश के सीजन के समाप्ति के साथ ही नदियां सूखने लगती है.
कभी दिखती थी हरियाली,अब छाई है वीरानी
कहा जाता है कि हिमालय के गोद में बसे नेपाल इन नदियों का मायका (नैहर) है.जहां से विभिन्न जलस्रोतों से पानी इकठ्ठा करती हुई ये नदियां जब भारतीय सीमाओं में प्रवेश करती थी तो पानी के साथ-साथ समृद्धि भी लाती थी.नदियों के किनारे के भूमि को उपजाऊ तथा हरा-भरा रखती थी,लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उल्टी है.सिर्फ बरसात के पानी से ही इन नदियों का अस्तित्व शेष है.जो भविष्य के लिए बेहतर संकेत नहीं है.लगातार हो रहा है अवैध खनन
बालू माफियाओं ने जिस प्रकार से नदियों का दोहन किया है वो किसी से छुपा नहीं है.आज भी कई घाटों पर चोरी-छिपे तो कहीं दिन के उजाले में भी अवैध खनन जारी है.और प्राकृतिक संपदा का लगातार दोहन हो रहा है.अंकुश के वावजूद बालू माफ़ियाओं का गोरखधंधा जारी है.
नदियां लगातार बदल रही है अपनी धारा
लगातार हो रहे अवैध खनन से नदियों ने अपनी धारा बदल ली हैऔर हर साल बदलती हुई दिखती है. आंकड़ों पर गौर करे तो तीन दशक पहले जिस स्थान पर नदी का मुख्य धारा था आज नदियां वहां से 50 मीटर तक दूर खिसक गई है तो कहीं ये आंकड़ा 100 मीटर के पार है.प्रदूषण है बड़ा कारण
सारे गंदगी को बेरोक-टोक नदियों के किनारों पर डाला जाता है जो बाद में नदी को भरने का काम करती है और इसी कारण से नदियां पहले जैसी नही रही.लगातार कम होती जा रही नदियों के गहराई भी बाढ़ का एक बड़ा कारण है.
नदियों की गहराई खत्म
बरसात के सीजन में थोड़ी सी पानी मे ही ये नदियां उफनकर अपने किनारों पर कहर बरपाती है और जो भी रास्ते मे आता है इसके कोप का शिकार होता है.बीते एक दशक में कई बार कनकई और बूढ़ी कनकई ने अपना रौद्र रूप दिखा दिया है.जब बाढ़ आती है तब सरकार और प्रशासन पूरी ताकत लगा कर राहत और बचाव करती है.लेकिन नदियों को जीवित रखने की कोई पहल नही होती.जब तक नदियों को साफ कर उसके जल धारा को ठीक नही किया जाएगा तब तक नदियां निर्मल नही होगी.?सीमा क्षेत्र की नदियां रेत के मैदान में तब्दील
दिघलबैंक प्रखंड में बहने वाली कनकई और बूढ़ी कनकई को नेपाल में माता का दर्जा प्राप्त है.हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर दोनों ही देश के हजारों श्रद्धालु सूरूंगा स्थित इसके घाट पर आस्था की डुबकी लगाकर इसे पूजतें है लेकिन यही नदी जब भारतीय सीमा में प्रवेश करती है तो केवल नाला और बालू के ढेर में तब्दील दिखती है. लिहाजा सभ्यता के विकसित होने में सदियों से अपनी भूमिका निभाने वाली ये पतित पावनी नदियां अब अपने अस्तित्व के लिए ही जूझ रही है.
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