ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट
Restaurant on Wheels: रेल यात्रियों को स्टेशन परिसर में ही ट्रेन की बोगी के भीतर बैठकर लजीज व्यंजनों का स्वाद चखाने की पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (NFR) की महत्वाकांक्षी ‘रेस्टोरेंट ऑन व्हील्स’ (Restaurant on Wheels) योजना ठाकुरगंज में विभागीय और निविदा (टेंडर) की कड़ियों में उलझकर दम तोड़ती नजर आ रही है. वर्ष 2023 में जब एक पुराना और अनुपयोगी रेल कोच ठाकुरगंज रेलवे स्टेशन पहुंचा था, तब स्थानीय लोगों और रेल उपभोक्ताओं में भारी उत्साह देखा गया था. लेकिन विडंबना देखिए कि तीन साल का लंबा वक्त गुजर जाने के बाद भी यह बोगी आज भी स्टेशन के सर्कुलेटिंग एरिया में लावारिस स्थिति में खड़ी उद्घाटन की प्रतीक्षा कर रही है, जबकि कटिहार रेल मंडल के अन्य स्टेशनों पर यह योजना सफलतापूर्वक राजस्व उगल रही है.
पहली बार ऊंची बोली और दूसरी बार कम बोली के पेंच में फंसा आवंटन
ठाकुरगंज में इस महत्वपूर्ण परियोजना के परवान न चढ़ने और टेंडर प्रक्रिया के फ्लॉप होने की इनसाइड स्टोरी निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझी जा सकती है:
- व्यावहारिक आकलन में फेल हुआ पहला ठेकेदार: रेलवे द्वारा इस परियोजना को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल पर संचालित करना था. पहली बार जब निविदा निकाली गई, तो एक निजी संचालक ने भारी उत्साह में बेहद ऊंची बोली (Aggressive Bidding) लगाकर टेंडर अपने नाम कर लिया. हालांकि, बाद में जब उसने ठाकुरगंज के स्थानीय बाजार, ग्राहकों की क्रय शक्ति और रोजाना के आय-व्यय का व्यावहारिक आकलन किया, तो उसे समझ आया कि इस दर पर रेस्टोरेंट चलाना घाटे का सौदा होगा. नतीजतन, ठेकेदार ने निर्धारित लाइसेंस फीस जमा नहीं की और अपनी सुरक्षा जमा राशि (Security Deposit) गंवाकर कदम पीछे खींच लिए, जिससे टेंडर रद्द करना पड़ा.
- अप्रैल 2025 में दूसरा प्रयास भी रहा नाकाम: पहली विफलता से सबक लेते हुए रेलवे ने अप्रैल 2025 में दोबारा री-टेंडर जारी किया. लेकिन इस बार पासा बिल्कुल उल्टा पड़ गया. स्थानीय बाजार की मंदी को देखते हुए इच्छुक निविदादाताओं द्वारा लगाई गई बोलियां रेलवे के तय आरक्षित मूल्य (Reserve Price) से काफी कम थीं. मानकों के अनुरूप राजस्व न मिलने के कारण वाणिज्य विभाग ने किसी भी आवेदक को वित्तीय आवंटन नहीं किया, और योजना दूसरी बार अधर में लटक गई.
कटिहार में 8 कोच रेस्टोरेंट चालू, ठाकुरगंज के साथ सौतेला व्यवहार क्यों?
मंडल के अन्य स्टेशनों की स्थिति: स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और रेल यात्रियों का गुस्सा इस बात को लेकर ज्यादा है कि इसी योजना के तहत पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के विभिन्न स्टेशनों पर वर्तमान में लगभग दर्जन भर रेल कोच रेस्टोरेंट सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं. अकेले कटिहार जंक्शन पर 8 कोच रेस्टोरेंट चल रहे हैं, जबकि अलीपुरद्वार में दो तथा रंगिया, लुमडिंग और तिनसुकिया में एक-एक रेस्टोरेंट का संचालन हो रहा है. ऐसे में ठाकुरगंज स्टेशन पर इस परियोजना को लेकर बरती जा रही सुस्ती समझ से परे है.
बिना प्लेटफॉर्म टिकट के भी आम जनता ले सकती थी रेलवे डाइनिंग का मजा
योजना की खासियत और महत्ता:
इस योजना की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) यह थी कि इसे रेलवे स्टेशन के मुख्य प्रवेश द्वार के पास सर्कुलेटिंग और पार्किंग क्षेत्र में स्थापित किया जाना था. इसका मतलब यह है कि यहाँ भोजन या नाश्ता करने आने वाले ठाकुरगंज के स्थानीय शहरवासियों को किसी भी प्लेटफॉर्म टिकट (Platform Ticket) को खरीदने की कानूनी बाध्यता नहीं होती. रेल यात्रियों के साथ-साथ आम लोग भी इस विंटेज रेल कोच के भीतर बैठकर ‘टेक-अवे’ और फाइन-डाइनिंग का लुत्फ उठा सकते थे, जिससे स्टेशन की खूबसूरती और पहचान दोनों बढ़ती.
रेलवे कम करे आरक्षित मूल्य, ठाकुरगंज को दें नई पहचान: उपभोक्ता
अधिकारियों का पक्ष और निष्कर्ष:
इस पूरे मामले पर कटिहार रेल मंडल के वाणिज्य विभाग (Commercial Department) के आला अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी और वित्तीय नियमों के कारण आवंटन प्रक्रिया रुकी हुई है. अपेक्षित और नियमानुकूल बोली प्राप्त होते ही इसे तुरंत निजी वेंडर को सौंपकर सिविल वर्क शुरू करा दिया जाएगा.
इधर, तीन वर्षों से खड़ा यह रेल कोच अब असामाजिक तत्वों का अड्डा और स्थानीय लोगों के बीच उपहास का विषय बनता जा रहा है. ठाकुरगंज के व्यवसायियों ने रेल प्रशासन से मांग की है कि स्थानीय छोटे बाजार की स्थिति को देखते हुए टेंडर के आरक्षित मूल्य में थोड़ी ढील दी जाए, ताकि स्थानीय उद्यमी आगे आ सकें और इस बंद पड़े प्रोजेक्ट को पुनर्जीवित कर ठाकुरगंज को एक आधुनिक सौगात मिल सके.
