पौआखाली से रणविजय की रिपोर्ट
Pipal Tree: किशनगंज जिले के पौआखाली नगर और ग्रामीण इलाकों में शनिवार को पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया, हिंदू धर्म में शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा-अर्चना का एक अत्यंत विशिष्ट और वैज्ञानिक महत्व माना गया है, ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनिवार को पीपल के पेड़ की विशेष पूजा करने और वहां दीपक प्रज्वलित करने से शनिदेव की टेढ़ी नजर, यानी शनि की साढ़े साती, ढैय्या और कुंडली के अन्य गंभीर नवग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है, इसी गहरी आस्था के साथ शनिवार को अहले सुबह से ही पौआखाली नगर के दुर्गा मंदिर के ठीक सामने स्थित अति प्राचीन पीपल वृक्ष के पास श्रद्धालुओं, विशेषकर महिला भक्तों की भारी भीड़ देखी गई, इसके अलावा क्षेत्र के विभिन्न ठाकुरबाड़ियों और सार्वजनिक स्थानों पर मौजूद पीपल वृक्षों के नीचे भी भक्तों ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्यता की मन्नतें मांगी.
क्या हैं पीपल वृक्ष से जुड़ी पौराणिक व धार्मिक मान्यताएं?
स्थानीय प्रबुद्ध पुरोहितों और आचार्यों के अनुसार, सनातन शास्त्रों में पीपल को ‘देव वृक्ष’ की संज्ञा दी गई है, शनिवार के दिन इस वृक्ष की महत्ता कई गुना बढ़ जाती है, जिससे जुड़े प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं:
- लक्ष्मी जी का वास और दरिद्रता का नाश: धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष में धन की देवी माता लक्ष्मी का विशेष वास होता है, जो भी व्यक्ति इस दिन पीपल के वृक्ष पर शुद्ध जल अर्पित करता है और शाम के समय सरसों के तेल का दीपक जलाता है, उसके घर से दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है और धन-धान्य का आगमन होता है.
- शनिदेव का वरदान: पौराणिक कथाओं के अनुसार, पिप्पलाद मुनि के कठोर तप से प्रसन्न होकर सूर्यपुत्र शनिदेव ने स्वयं यह वरदान दिया था कि शनिवार के दिन जो भी प्राणी पीपल के वृक्ष की सेवा और पूजा करेगा, उसे शनि की साढ़े साती, ढैय्या या किसी भी प्रकार के क्रूर शनि प्रकोप का सामना नहीं करना पड़ेगा.
- त्रिदेवों का पवित्र निवास: शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल के जड़ में जगत के पालनहार भगवान विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में हरि और फल में ब्रह्मांड के सभी देवी-देवताओं का सामूहिक वास होता है, इसलिए इसकी एक पूजा से सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त हो जाता है.
श्रद्धालुओं ने कलावा बांधकर की परिक्रमा, मांगी सुख-शांति
पूजन विधि: शनिवार की सुबह से ही नगर के विभिन्न जलाशयों में स्नान कर पवित्र होकर श्रद्धालु थाली में जल, कच्चा दूध, अक्षत (चावल), चंदन, धूप और पुष्प लेकर देव वृक्ष के पास पहुंचे, भक्तों ने पूरी श्रद्धा के साथ पीपल की जड़ में जल अर्पित किया और उसके बाद वृक्ष के चारों ओर सात बार परिक्रमा करते हुए सूती रक्षा सूत्र (कलावा) बांधा.
सूर्यास्त के बाद शाम के दीपदान का है विशेष महत्व
ज्योतिषविदों और कर्मकांड के जानकारों ने बताया कि शनिवार की शाम को सूर्यास्त के बाद पीपल वृक्ष के नीचे किया जाने वाला दीपदान अत्यंत फलदायी और चमत्कारी माना जाता है, इस समय पीपल के नीचे सरसों के तेल का चौमुखा (चार मुख वाला) दीपक जलाने से राहु-केतु और शनि की पीड़ा शांत होती है और व्यापार व नौकरी में आ रही तमाम बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं, यही वजह है कि सुबह के साथ-साथ शनिवार की देर शाम को भी मंदिरों में दीप जलाने के लिए श्रद्धालुओं की चहल-पहल बनी रही.
