किशनगंज जिले के पौआखाली प्रखंड सहित पूरे सीमांचल क्षेत्र में शुक्रवार को आषाढ़ मास की अंतिम तिथि के पावन अवसर पर बंगाली समाज के घरों में श्रद्धा, आस्था और अटूट भक्तिभाव के साथ मां विषहरी (माता मनसा देवी) की विशेष पूजा-अर्चना की गई. इस पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान के दौरान महिलाओं और परिवार के अन्य सदस्यों ने मां विषहरी की पूरे विधि-विधान से आराधना की. श्रद्धालुओं ने माता से परिवार की सुख, समृद्धि, मंगलकामना और सर्पदंश (सांप के काटने) सहित सभी प्रकार की प्राकृतिक विपत्तियों से रक्षा की गुहार लगाई. इसके साथ ही उत्तम खेती के लिए अच्छी वर्षा और धन-धान्य में वृद्धि की प्रार्थना भी की गई.
महिलाओं ने रखा निर्जला व्रत, सुनी मां मनसा की पावन कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां विषहरी की पूजा में कथा श्रवण का विशेष महत्व है:
- कथा वाचन व श्रवण: इस पावन अवसर पर घर की महिलाओं ने पवित्रता के साथ व्रत (उपवास) रखा. दोपहर के समय वे मां विषहरी की वेदी के समीप एकत्रित हुईं और माता मनसा देवी की महिमा से जुड़ी पौराणिक कथा का विधिवत वाचन एवं श्रवण किया.
- प्रसाद वितरण: श्रद्धालुओं ने पूरे मनोयोग और एकाग्रता से कथा सुनकर माता का आशीर्वाद प्राप्त किया. पूजा अनुष्ठान के मुख्य चरण संपन्न होने के बाद, उपस्थित श्रद्धालुओं और आस-पड़ोस के लोगों के बीच नाना प्रकार के मौसमी फलों, मिठाई और विशेष नैवेद्य का महाप्रसाद वितरित किया गया.
सीमांचल के चार जिलों में दिखता है व्यापक सांस्कृतिक प्रभाव
गौरतलब है कि बंगाली समाज में आषाढ़ मास की अंतिम तिथि पर मां विषहरी की पूजा का विशेष धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व माना जाता है.
भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से सीमांचल के किशनगंज, अररिया, पूर्णियां और कटिहार जिलों में बंगाली पंचांग को मानने वाले लोगों की अत्यधिक आबादी है. यही कारण है कि इन चारों सीमावर्ती जिलों के ग्रामीण व शहरी इलाकों में लगभग हर घर में मां विषहरी की पूजा बेहद धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ आयोजित की जाती है.
सर्वमान्य धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से मां विषहरी की आराधना करता है, उसके परिवार में सालों भर सुख-शांति का वास रहता है तथा विषैले जीवों व अन्य संकटों से रक्षा होती है. इसी अडिग विश्वास के साथ हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने-अपने घरों में इस पारंपरिक पूजा को पूरी निष्ठा के साथ आयोजित करते आ रहे हैं.
