कई दिनों से हरी चाय पत्ती (Green Tea Leaves) की खरीद बंद रहने के कारण भारी संकट से जूझ रहे बिहार के एकमात्र प्रमुख चाय उत्पादक जिले किशनगंज के हजारों छोटे चाय किसानों के लिए सोमवार का दिन बड़ी राहत लेकर आया. जलपाईगुड़ी के सांसद डॉ. जयंत कुमार राय की मध्यस्थता में छोटे चाय उत्पादकों और बटलिफ (Bought Leaf) फैक्ट्रियों के बीच हुई बैठक में सहमति बन गई, जिसके बाद फैक्ट्रियों ने पुनः पत्ती की खरीद शुरू कर दी है.
सुबह से ही बागानों में जुटने लगे मजदूर
फैक्ट्रियों द्वारा खरीद की हरी झंडी मिलते ही किशनगंज जिले के चाय बागानों में दोबारा रौनक लौट आई:
- तुड़ाई में आई तेजी: ठाकुरगंज, पोठिया और आसपास के चाय बागानों में सुबह से ही मजदूर और आधुनिक मशीनें हरी पत्तियों की तुड़ाई में जुट गए. ताजी पत्तियों को बोरों में भरकर प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों के लिए रवाना किया गया.
- फसल की गुणवत्ता बचाने की होड़: खरीद बंद रहने से पौधों पर ही पत्तियां बड़ी हो रही थीं, जिससे उनकी गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों घटने का डर था. खरीद शुरू होते ही किसानों ने तेजी से तुड़ाई शुरू की.
क्यों बंद हुई थी खरीद?
उत्तर बंगाल की बटलिफ फैक्ट्रियों ने चाय पत्ती में प्रतिबंधित रसायनों एवं कीटनाशकों (Pesticides) के इस्तेमाल और गुणवत्ता संबंधी चिंताओं को लेकर खरीद पर अस्थायी रोक लगा दी थी:
- किशनगंज पर असर: चूंकि किशनगंज में उत्पादित अधिकांश हरी चाय पत्ती उत्तर बंगाल की प्रोसेसिंग यूनिट्स में भेजी जाती है, इसलिए इस फैसले का सबसे बुरा असर यहीं के किसानों और खेतिहर मजदूरों पर पड़ा था.
- आजीविका पर संकट: खरीद रुकने से किसानों के आर्थिक नुकसान के साथ-साथ परिवहन व्यवसाय और बागान मजदूरों के सामने भी रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था.
बैठक में बनी सहमति, रसायनों के सही इस्तेमाल की अपील
सांसद की पहल पर हुई बैठक में चाय उद्योग के सभी हितधारकों ने मिलकर काम करने का संकल्प लिया:
सुरक्षित खेती पर जोर: किसानों से अपील की गई है कि वे चाय बागानों में सरकार द्वारा प्रतिबंधित रसायनों और कीटनाशकों का प्रयोग न करें. केवल स्वीकृत कृषि रसायनों का ही इस्तेमाल करें, ताकि भारतीय चाय की वैश्विक गुणवत्ता और विश्वसनीयता बनी रहे.
आजीविका लौटी पटरी पर
किशनगंज जिला बिहार में चाय उत्पादन का गढ़ माना जाता है. हजारों छोटे किसान और मजदूर सीधे तौर पर इस उद्योग से जुड़े हैं. खरीद प्रक्रिया नियमित होने से किसानों को उम्मीद है कि उन्हें उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलेगा और स्थानीय चाय उद्योग एक बार फिर रफ्तार पकड़ेगा.
