दिगंबर जैन भवन में दाम्पत्य और गृहस्थ संस्कार विधि का आयोजन, 125 जोड़ों समेत 290 श्रावक-श्राविकाएं हुए शामिल

श्री दिगंबर जैन भवन में दाम्पत्य और गृहस्थ संस्कार विधि का सफल आयोजन हुआ, जिसमें 125 जोड़ों ने भाग लिया. मुनि श्री अरिजीत सागर जी महाराज ने प्रेम, सहनशीलता और त्याग से गृहस्थी को सुखमय बनाने के गुर सिखाए. इस दौरान अहंकार को कलह का मुख्य कारण बताया गया.

किशनगंज. आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री अरिजीत सागर जी महाराज के सान्निध्य में रविवार को श्री दिगंबर जैन भवन में दाम्पत्य संस्कार विधि तथा गृहस्थ संस्कार विधि का मंगलमय आयोजन किया गया. आचार्य जिनसेन स्वामी के आदिपुराण में वर्णित संस्कारों पर आधारित यह सत्र दोपहर दो बजे से शाम 5.30 बजे तक चला. इसमें 125 जोड़ों सहित 40 एकल व्यक्तियों ने भाग लिया. कुल 290 श्रावक-श्राविकाएं शुद्ध वस्त्रों में आयोजन में मौजूद रहे.

चित्र अनावरण और दीप प्रज्वलन से हुआ शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन और मंगलाचरण के साथ हुआ. इसके बाद मुनि श्री अरिजीत सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन और शास्त्र भेंट की गयी. धार्मिक विधि-विधान के बीच श्रद्धालुओं ने पूरे अनुशासन और श्रद्धा के साथ संस्कार कार्यक्रम में सहभागिता की.

फोटो- यज्ञ में जैन श्रद्धालु | Prabhat Khabar Network

मंत्रोच्चारण से संस्कार स्थल को किया गया पवित्र

मुनि श्री ने मंत्रोच्चारण के माध्यम से चारों दिशाओं के देवी-देवताओं का आह्वान कर संस्कार स्थल को पवित्र किया. नमस्कार मंत्र और ॐ की ध्वनि से पूरा वातावरण शांतिमय हो गया. इसके बाद प्रतिक्रमण के माध्यम से श्रद्धालुओं को अपनी गलतियों को स्वीकार करने और भविष्य में उन्हें दोबारा नहीं दोहराने का संकल्प कराया गया. मंत्रोच्चारण के साथ लौंग और चावल के माध्यम से सभी का शुद्धिकरण भी किया गया. धार्मिक संस्कारों के दौरान श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा के साथ विधि में भाग लिया.

प्रेम और त्याग से मजबूत होती है गृहस्थी

प्रवचन के दौरान मुनि श्री अरिजीत सागर जी महाराज ने गृहस्थ जीवन को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया. उन्होंने कहा कि जिस तरह व्यापार में ईमानदारी, बुद्धिमत्ता और मेहनत से सफलता मिलती है, उसी तरह गृहस्थ जीवन प्रेम, सहनशीलता, आदर और त्याग से सुखपूर्वक चलता है. उन्होंने कहा कि आज परिवारों में होने वाले टकराव की मुख्य जड़ अहंकार है. आपसी सम्मान और समझदारी से परिवार में कलह की स्थिति को कम किया जा सकता है.

दया, करुणा और संयम का दिया संदेश

मुनि श्री ने कहा कि अनेक योनियों में भटकने के बाद मानव जीवन प्राप्त हुआ है. इसलिए प्रत्येक प्राणी के प्रति दया, करुणा और सहयोग का भाव रखना चाहिए. उन्होंने काम, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों को त्यागकर संयमित जीवन जीने का संदेश दिया. उन्होंने कहा कि संयमित और सदाचारी जीवन के माध्यम से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है. प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं ने जीवन में इन मूल्यों को अपनाने का संकल्प लिया.

संगीतमय वातावरण में हुआ विसर्जन

कार्यक्रम के समापन पर संगीतमय वातावरण में देवी-देवताओं का विसर्जन किया गया. पूरे आयोजन के दौरान श्री दिगंबर जैन भवन में धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण बना रहा. कार्यक्रम को सफल बनाने में जैन युवा मंडल और महिला मंडल की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

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लेखक के बारे में

By अवधेश कुमार

अवधेश कुमार विगत 25 वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. इन्होंने बतौर पत्रकार अपने कैरियर की शुरूआत वर्ष 2001 से की. उसके बाद विगत 15 वर्षो से प्रभात खबर, किशनगंज के कार्यालय प्रभारी के रूप में कार्यरत हैं. इनकी रूचि राजनीतिक, सामाजिक व अपराध से जुड़ी खबरों में है.

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