गलगलिया (किशनगंज) से विवेक चौधरी की रिपोर्ट
Indo Nepal Tea Trade: भारत-नेपाल अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित किशनगंज जिले के गलगलिया प्रक्षेत्र सहित सीमांचल और उत्तर बंगाल की चाय कड़ियों में इन दिनों जबरदस्त व्यापारिक हड़कंप मचा हुआ है. भारतीय चाय बोर्ड द्वारा सीमावर्ती पानीटंकी और गलगलिया कस्टम पॉइंट पर लागू की गई नई कड़क मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) ने नेपाली चाय के भारतीय बाजारों में प्रवेश पर पूरी तरह ब्रेक लगा दिया है. गुणवत्ता जांच की इस नई तकनीकी विसंगति और जटिल प्रक्रिया के कारण नेपाल के प्रमुख ऑर्थोडॉक्स और सीटीसी चाय उत्पादक प्रक्षेत्रों जैसे इलाम, कन्याम, फिक्कल, सूर्योदय, पाथीभारा और झापा के चाय बागानों व फैक्ट्रियों के सामने अस्तित्व का गंभीर संकट खड़ा हो गया है. स्थिति यह है कि बिक्री ठप होने से करोड़ों रुपये की तैयार चाय गोदामों में सड़ने की कगार पर पहुंच गई है.
गोदामों में कैद हुई करोड़ों की पूंजी; देखें डंप माल के आंकड़े
- भारतीय गोदामों में फंसा माल: नई नीति के तहत जांच रिपोर्ट आने में हो रही महीनों की देरी के कारण भारतीय सीमा के भीतर विभिन्न कस्टम वेयरहाउस और गोदामों में करीब 2 लाख किलोग्राम से अधिक तैयार चाय अटकी पड़ी है.
- नेपाल की फैक्ट्रियों में हाहाकार: इधर निर्यात का रास्ता बंद होने के बावजूद बागानों में उत्पादन जारी रहने से नेपाल के उद्योगों में लगभग 10 लाख किलोग्राम से अधिक तैयार चाय का भारी भंडार जमा हो चुका है. बाजार में बिक्री न होने से चाय कप्तानों (उद्योगपतियों) की पूरी कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) ब्लॉक हो गई है.
SOTPAN ने दोनों सरकारों से लगाई गुहार; फैक्ट्रियों पर बंदी का ताला
“भारतीय चाय बोर्ड द्वारा लागू नई लैब टेस्टिंग प्रक्रिया के कारण क्लियरेंस रिपोर्ट मिलने में कई-कई महीने का समय लग रहा है. इस अव्यावहारिक नीति के कारण चाय की शेल्फ-लाइफ और खुशबू प्रभावित हो रही है. यदि दोनों देशों की सरकारों ने राजनयिक कमान संभालकर इसका तात्कालिक और व्यावहारिक समाधान नहीं निकाला, तो नेपाल की अधिकांश ऑर्थोडॉक्स फैक्ट्रियां अनिश्चितकाल के लिए बंद होने को मजबूर हो जाएंगी.” — सूर्योदय ऑर्थोडॉक्स टी प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन नेपाल (SOTPAN)
किसानों और कली-मजदूरों के चूल्हे ठप होने की आशंका; सीमावर्ती अर्थव्यवस्था जमींदोज
चाय उद्योग में आई इस ऐतिहासिक मंदी का सीधा और सबसे क्रूर प्रहार ग्रामीण प्रक्षेत्र के किसानों और बागान श्रमिकों पर पड़ रहा है. फैक्ट्रियों द्वारा हरी पत्तियों (ग्रीन लीव्स) की खरीद में 50% से अधिक की कटौती कर दिए जाने के कारण सीमावर्ती इलाकों के छोटे किसानों की मेहनत की फसल खेतों में ही बर्बाद हो रही है. इसके अतिरिक्त, नगद भुगतान न मिलने से कनिष्ठ व वरिष्ठ श्रमिकों को दैनिक राशन के लिए भी फजीहत झेलनी पड़ रही है.
व्यापारिक विश्लेषकों के अनुसार, इस संकट का असर केवल नेपाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के काकरभिट्टा, पानीटंकी और गलगलिया जैसे मुख्य सीमावर्ती व्यापारिक केंद्रों की लॉजिस्टिक कड़ियों पर भी पड़ेगा. चाय के परिवहन, पैकेजिंग, लोडिंग-अनलोडिंग से जुड़े हजारों कली-मजदूरों और ट्रक ऑपरेटरों का रोजगार पूरी तरह ठप होने की कगार पर है. फिलहाल पूरा सीमांचल और नेपाल का चाय प्रक्षेत्र नई दिल्ली और काठमांडू के बीच होने वाले उच्च स्तरीय संवाद और किसी बड़ी राहत संबल की उम्मीद में टकटकी लगाए बैठा है.
