ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट
Illegal Mining: 13 वर्षीय मासूम रोहित सहनी अब कभी अपने घर नहीं लौटेगा. उसकी मां की चीत्कार और रोने की आवाजें अब किसी जवाब की प्रतीक्षा में थक चुकी हैं, और उसके दोस्तों के खेल का एक साथी हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ गया है. लेकिन किशनगंज जिले के कुर्लिकोट थाना क्षेत्र अंतर्गत रेल गेट के समीप स्थित एक गहरे तालाब में डूबकर हुई रोहित की यह मौत केवल एक परिवार का व्यक्तिगत दुख नहीं है. यह उस भ्रष्ट और संवेदनहीन व्यवस्था पर एक तमाचा है, जिसने विकास, सरकारी योजनाओं और निजी ईंट-भट्ठा मालिकों के मुनाफे के लिए पूरे ठाकुरगंज प्रखंड में ‘मौत के दर्जनों जाल’ बिछा रखे हैं. प्रथम दृष्टया यह एक सामान्य हादसा लग सकता है, लेकिन जब इस घटना की जमीनी हकीकत की परतें खुलती हैं, तो एक बेहद डरावना सच सामने आता है.
लहलहाते खेत गायब हुए, पीछे रह गए 15 फीट गहरे जानलेवा गड्ढे
स्थानीय ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, ठाकुरगंज प्रखंड और उसके सुदूर ग्रामीण इलाकों में फैले ये अनगिनत जलाशय प्राकृतिक या कुदरती नहीं हैं. यह सब अवैध खनन और गैर-जिम्मेदाराना खुदाई की देन हैं:
- मिट्टी का अंधाधुंध कारोबार: पिछले एक दशक में ठाकुरगंज क्षेत्र में अवैध और वैध ईंट भट्ठों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है. इसके साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गों (NH), ग्रामीण सड़कों और सरकारी भवनों के निर्माण के लिए मिट्टी की मांग आसमान छूने लगी.
- नियमों को ताक पर रख खुदाई: इस मांग की आड़ में भू-माफियाओं और संवेदकों (ठेकेदारों) ने स्थानीय गरीब किसानों की उपजाऊ कृषि योग्य भूमि को निशाना बनाया. ग्रामीणों ने बताया कि कई जगहों पर नियमों को ताक पर रखकर जमीन से 5 फीट या 10 फीट ही नहीं, बल्कि 15 फीट की गहराई तक जेसीबी (JCB) मशीनों से मिट्टी खोद डाली गई.
मिट्टी तो ट्रैक्टरों और ट्रकों में भरकर चली गई, जिससे ईंटें पक गईं और पक्की सड़कें बन गईं. ठेकेदारों की जेबें गर्म हो गईं, लेकिन किसानों के खेतों के पीछे छूट गए सिर्फ गहरे और डरावने खड्डे. समय बीतने के साथ इन गड्ढों में मानसून और बरसात का पानी जमा हो गया और इन्होंने स्थाई जलाशयों का रूप ले लिया. आज स्थिति यह है कि जहाँ कभी धान, मक्का और गेहूं की फसलें लहलहाती थीं, वहाँ आज इंसानों को लीलने वाले गहरे गड्ढे नजर आते हैं.
न चेतावनी बोर्ड, न घेराबंदी: सुरक्षा के नाम पर सिर्फ प्रशासनिक बेरुखी
सुरक्षा मानकों का उल्लंघन: सबसे गंभीर और विचलित करने वाली बात यह है कि खनन माफियाओं द्वारा छोड़े गए इन विशालकाय गड्ढों के चारों ओर सुरक्षा का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है.
किसी भी सरकारी गाइडलाइन के अनुसार खनन स्थल या गहरे तालाब के पास चेतावनी बोर्ड लगाना, कटीले तारों से घेराबंदी (बैरिकेडिंग) करना और निगरानी रखना अनिवार्य है. परंतु ठाकुरगंज के इन कृत्रिम तालाबों के पास ऐसा कुछ नहीं है. भीषण गर्मी के इस मौसम में मासूम ग्रामीण बच्चे इन्हें सामान्य पोखरा समझकर नहाने और तैरने पहुंच जाते हैं. लेकिन पानी के भीतर मौजूद अचानक की गहराई, नुकीले कंक्रीट और खतरनाक दलदली हिस्सा बच्चों को संभलने का मौका तक नहीं देता, जिससे रोहित जैसे निर्दोष बच्चे असमय काल के गाल में समा जाते हैं.
मिट्टी से मुनाफा किसने कमाया, इसकी सजा ग्रामीण और बच्चे क्यों भुगतें?
रोहित की दर्दनाक मौत के बाद अब ठाकुरगंज की जनता प्रशासन से सीधे और असहज करने वाले सवाल पूछ रही है:
- अनुमति का सच: खेतों से व्यावसायिक उपयोग के लिए इतनी भारी मात्रा में मिट्टी की खुदाई किसकी अनुमति या एनओसी (NOC) से हुई?
- समतलीकरण की शर्त: क्या खनन विभाग और अंचल कार्यालय (CO) ने खुदाई के बाद संबंधित भूमि को दोबारा समतल (लेवल) करने की शर्त संवेदक पर लागू की थी?
- पर्यावरणीय मानक: क्या इन गड्ढों के निर्माण के समय सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों की जांच की गई? यदि हां, तो ठेकेदारों ने इन खतरनाक गड्ढों को खुला क्यों छोड़ दिया?
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि मिट्टी बेचने वाले जमींदारों और उसे खरीदने वाले ईंट-भट्ठा मालिकों ने तो करोड़ों का मुनाफा कूट लिया, लेकिन इसका जानलेवा खामियाजा आज गांव के निर्दोष लोगों और उनके बच्चों को भुगतना पड़ रहा है.
हर बरसात के साथ बढ़ता है मौत का ग्राफ, सर्वे की मांग तेज
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि जैसे ही बरसात का मौसम शुरू होता है, इन कृत्रिम गड्ढों में जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर चला जाता है. पानी के ऊपर उगने वाली जलकुंभी और घास के कारण राहगीरों और बच्चों को गहराई का सही अंदाजा नहीं मिल पाता. इसमें अक्सर मवेशी फंसकर मर जाते हैं, राहगीर गिर जाते हैं और बच्चे डूब जाते हैं. हर साल मानसून में यहाँ मातम पसरा रहता है, लेकिन आज तक जिला प्रशासन या प्रखंड प्रशासन द्वारा ऐसे खतरनाक स्थलों का कोई व्यापक सर्वे नहीं कराया गया.
ग्रामीणों की मुख्य मांगें:
- क्रैश सर्वे: ठाकुरगंज प्रखंड के सभी कृत्रिम जलाशयों और ईंट-भट्ठों के लिए खोदे गए गड्ढों का तत्काल आधिकारिक सर्वे कराया जाए.
- फेंसिंग और बोर्ड: खतरनाक श्रेणी वाले सभी गड्ढों को चिह्नित कर भट्ठा मालिकों के खर्च पर उनकी घेराबंदी की जाए और लाल रंग के चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं.
- एफआईआर और जवाबदेही: रोहित की मौत के जिम्मेदार जमीन मालिक और मिट्टी का उत्खनन करने वाले संवेदक पर गैर-इरादतन हत्या की प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए.
निष्कर्ष: रोहित को पानी ने नहीं, व्यवस्था की लापरवाही ने मारा है
रोहित सहनी की मौत ने पूरे किशनगंज जिले के सामने एक सुलगता हुआ सवाल खड़ा कर दिया है. आखिर कब तक चंद रुपयों के मुनाफे के लिए मासूम जिंदगियों की आहुति दी जाती रहेगी? कब तक अन्नदाताओं के लहलहाते खेतों को मौत के कुएं में बदला जाता रहेगा? सच तो यही है कि रोहित की जान पानी ने नहीं ली है, उसकी जान उस प्रशासनिक लापरवाही और सांठगांठ ने ली है, जिसने मिट्टी के इस काले कारोबार को सालों तक खुली आंखों से अनदेखा किया. देखना यह है कि इस हादसे के बाद किशनगंज जिलाधिकारी और पुलिस प्रशासन इस पर क्या कड़ा एक्शन लेते हैं.
