ठाकुरगंज : आस्था प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का सबसे बड़ा उत्सव गणगौर गुरुवार को संपन्न हो गया. 18 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार के अंतिम दिन महानंदा नदी के तट पर गणगौर का विसर्जन किया गया. इस दौरान महिलाएं अपने घरों से गणगौर का पूजन कर समूह में गीत गाती हुई गणगौर को सिर पर रख कर नदी के तट तक गयी और गणगौर को नदी में विसर्जन किया. इसके बाद एक दूसरे को गुलाल लगाकर खुशियां मनायी.
बताते चलें होली के दूसरे दिन से शुरू यह पर्व चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की तीज को समाप्त होता है. इस दिन कुंवारी लड़कियां एवं विवाहित महिलाएं शिवजी (इसर जी) और पार्वती जी (गौरी) की पूजा करती हैं . पूजा करते हुए दूब से पानी के छांटे देते हुए गोर गोर गोमती गीत गाती हैं. गण (शिव) तथा गौर(पार्वती) के इस पर्व में कुंवारी लड़कियां मनपसंद वर पाने की कामना करती हैं. विवाहित महिलाएं चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पूजन तथा व्रत कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं.
ऐसा माना जाता है कि माता गवरजा होली के दूसरे दिन अपने पीहर आती हैं तथा आठ दिनों के बाद ईसर (भगवान शिव) उन्हें वापस लेने के लिए आते हैं. चैत्र शुक्ल तृतीया को उनकी विदाई होती है. गणगौर की पूजा में गाये जाने वाले लोकगीत इस अनूठे पर्व की आत्मा हैं. इस पर्व में गवरजा और ईसर की बड़ी बहन और जीजाजी के रूप में गीतों के माध्यम से पूजा होती है तथा उन गीतों के बाद अपने परिजनों के नाम लिए जाते हैं. राजस्थानी परिवारों में गणगौर पूजन एक आवश्यक वैवाहिक रस्म के रूप में भी प्रचलित है. गणगौर पूजन में कन्यायें और महिलायें अपने लिए अखंड सौभाग्य ,अपने पीहर और ससुराल की समृद्धि तथा गणगौर से हर वर्ष फिर से आने का आग्रह करती हैं.
