सीमांचल के किशनगंज और सहरसा जिलों में चुनावी हलचल के साथ राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू हो चुकी है. दोनों जिलों में विधानसभा की चार-चार सीटें हैं. पिछले चुनाव में इनमें से दो-दो सीटें कांग्रेस, राजद और जदयू का तथा एक-एक सीट भाजपा और लोजपा को मिलीं थीं.
2014 के उपचुनाव में राजद की एक सीट जदयू ने छीन ली थी. वर्तमान गंठबंधन के आधार पर बात करें, तो महागंठबंधन के पास छह और राजग के पास दो सीटें हैं. जाहिर है कि महागंठबंधन होने से इसके घटक दलों की ताकत पहले से ज्यादा हुई है, जबकि राजग के लिए उनकी सीटें कम करने और अपनी सीट संख्या बढ़ाने की बड़ी चुनौती होगी.
प्रारंभ हो चुकी है. विभिन्न दल व स्थानीय नेता अपनी सीट पक्की करने की फिराक में लग चुके है. प्रारंभ से विभिन्न विधान सभा क्षेत्रों की परिस्थितियां लगातार बदली रही है. फिर भी कई उम्मीदवारों ने पार्टी बदलकर तो कई ने एक ही पार्टी में रहकर अपना दबदबा बनाये रखा है.
किशनगंज जिला ही देश के चाय उत्पादक राज्यों में बिहार को शामिल कराता है. अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को जोड़नेवाला यह जिला मुसलिम बहुल है. यही कारण है कि चुनाव के पूर्व यहां पर एमआइएम के सदर ओबैसी भी सभा कर चुके हैं, हालांकि उन्होंने अपना पत्ता नहीं खोला है कि उनकी पार्टी चुनाव लड़ेगी या नहीं.
किशनगंज
किशनगंज विधानसभा सीट का भूगोल नये परिसमीन के बाद पूरी तरह बदल गया है. नये परिसीमन में पोठिया प्रखंड इस विधानसभा क्षेत्र में शामिल हो गया है. इस सीट पर वर्तमान में कांग्रेस का कब्जा है.
2010 के विधानसभा चुनाव में उसके डॅ जावेद आजाद ने 38867 मत से जीत हासिल की थी, जबकि दूसरे स्थान पर रही भाजपा प्रत्याशी को 38603 मत प्राप्त हुए थे. वह इस बार भी भाजपा की प्रबल दावेदार मानी जा रही हैं. हालांकि इस पार्टी से टिकट के दावेदारों की सूची लंबी है. इनमें त्रिलोक चंद जैन, अनवार युसूफ, संजीव यादव, राजेश्वर वैद, डा इच्छित भारत, पार्टी के जिलाध्यक्ष अभिनव मोदी के नाम ज्यादा चर्चा में हैं.
महागंठबंधन में भी टिटक के कई दावेदार हैं. यह सीट कांग्रेस के खाते में जायेगी, इसकी उम्मीद ज्यादा है. विधानसभा के अलावा लोकसभा चुनाव में भी इस क्षेत्र में कांग्रेस का प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ रहा था. भाजपा लोकसभा चुनाव में भी दूसरे स्थान पर रही थी, जबकि जदयू को तीसरा स्थान मिला था. इस लिहाज से भी महागंठबंधन में कांग्रेस की सीट की दावेदारी ज्यादा मजबूत है. तृणमूल कांग्रेस, झामुमो व वामपंथी पार्टियां भी यहां अपने उम्मीदवार दे सकती हैं.
अब तक
इस विधानसभा सीट पर नौ बार कांग्रेस, दो बार राजद, एक बार जनता दल, एसडब्ल्यू एक बार, पीएसपी, जेएमपी (एसपी), एलकेडी का एक बार कब्जा रहा.
इन दिनों
भाजपा व राजद-जदयू का जनसंपर्क अभियान जारी है. जदयू का हर घर दस्तक कार्यक्रम पूरा हो चुका है. भाजपा का परिवर्तन रथ के जरिये जनसंपर्क में लगी है.
प्रमुख मुद्दे
किसानों को उसकी उपज का सही मूल्य दिलाने की व्यवस्था
रोजगार के साधन और औद्योगक विकास
शहरी और ग्रामीण इलाकों में बिजली-पानी.
कोचाधामन
दावेदारों की लिस्ट लंबी
कोचाधामन विधानसभा सीट पर पिछले चुनाव में राजद को जीत मिली थी. इसके अख्तरूल इमान ने जदयू के मुजाहिद आलम को मतों के बड़े अंतर से हराया था, लेकिन लोकसभा चुनाव के समय वह पार्टी बदल कर जदयू में शामिल हो गये थे. उन्होंने जदयू के टिकट पर लोकसभा चुनाव भी लड़ा था.
उनके इस्तीफा से रिक्त हुई इस विधानसभा सीट पर पिछले साल उपचुनाव हुआ, जिसमें जदयू के मास्टर मुजाहिद विधायक चुने गये. अब ये दोनों दल एक गंठबंधन के घटक हैं. अख्तरुल ने अब तक घोषित रूप से कोई नया दल नहीं चुना है. सीटिंग गेटिंग के आधार पर मास्टर मुजाहिद का टिकट तय माना जा रहा है. वहीं, कांग्रेस के सादिक समदानी, राजद के इंतखाब आलम बबलू आदि भी चुनाव लड़ने के मूड में हैं.
भाजपा में भी संभावित उम्मीदवार के रूप में कई नाम हैं. इसमें मशकूर आलम, शादिक मुखिया, इजहार अशफी, ए रहमान आदि की चर्चा ज्यादा है. एनडीए के अन्य घटक दल के नेता भी टिकट की दावेदारी में लगे हुए हें. अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि राजग में यह सीट किस घटक दल के कोटे में जाती है.हालांकि सीट बंटवारे के बाद कुछ प्रभावशाली निर्दलीय उम्मीदवारों के उतरने की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है.
अब तक
नये परिसीमन के बाद वर्ष 2000 में यह विधानसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया. इस सीट पर अब तक दो बार राजद का व एक बार जदयू प्रत्याशी ने जीत दर्ज की है.
इन दिनों
जदयू का हर घर दस्तक कार्यक्रम लगभग पूरा हो चुका है. भाजपा बूथ स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलन कर चुकी है. गांव-गांव में उसका परिवर्तन रथ घूम रहा है.
प्रमुख मुद्दे
नदी के कटाव को रोकना
महानंदा पुल के मस्तान चौक पर वैकल्पिक व्यवस्था
कन्हैयाबाड़ी और हल्दीखोड़ा को प्रखंड का दर्जा
विधि व्यवस्था.
बहादुरगंज
बागी तेवर से सहमें हैं सभी दल
बहादुरगंज विधानसभा पर 2000 से कांग्रेस का कब्जा लगातार कायम है. इसके तौसीफ आलम ने लगातार चार बार जीत हासिल की है. पिछले चुनाव में उन्होंने जदयू के मो मुसब्बर आलम को हराया था. महागंठबंधन में सीटिंग सीट के आधार पर इस बार भी तौसीफ का टिकट तय माना जा रहा है, लेकिन मुसब्बिर भी चुनाव लड़ने के मूड में हैं.
राजद के इकरामूल हक बागी, अंजार आलम, इंडियन मुस्लिम लीग से इमरान आलम भी प्रयास में जुटे हुए हैं. ऐसे में दलों के बीच सीट के बंटवारे तक घटक दल के नेताओं की भाग-दौड़ जारी रहेगी. एनडीए में पेंच फंसा हुआ है. लोजपा के मंजर हसनैन उर्फ कलक्टर, भाजपा की खोशो देवी, अवध बिहारी सिंह, शकील राही, पीपी सिन्हा आदि टिकट के दावेदार हैं. बहरहाल एनडीए में यह सीट किस घटक दल को जायेगी, इसका कयास लगाना मुश्किल है.
इस बात की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ नेता पार्टी से टिकट न मिलने पर दूसरे दल का दामन थाम सकते हैं या निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं. लिहाजा सभी दलों में बगावत का खतरा बना हुआ है. यह टिकट पाने वाले नेता के लिए चुनाव में मुश्किलें भी पैदा कर सकता है. वैसे गंठबंधन के नये स्वरूप में इस सीट की परिस्थितियां पिछले चुनाव से बहुत अलग हैं.
अब तक
इस विधान्सभा सीट से दस बार कांग्रेस, एक बार बीजेपी, एक बार आइएनडी, दो बार पीएसपी, एक बार जेएमपी के प्रत्याशी ने जीत दर्ज की है.
इन दिनों
भाजपा ग्रास रूट पर संगठन को मजबूत करने तथा गांव-गांव में नरेंद्र मोदी का संदेश पहुंचने में जुटी है. महागंठबंधन स्वाभिमान महारैली की तैयारी में लगा है.
प्रमुख मुद्दे
टेढ़गाछ प्रखंड का जिला मुख्यालय से सड़क संपर्क
रतुआ व कनकई नदी पर पुल
जजर्र सड़कों की मरम्मती
बिजली की नियमित आपूर्ति
उच्च शिक्षा व बेहतर स्वास्थ्य सेवा.
ठाकुरगंज
चुनाव के पहले ही बड़ा उलट-फेर
ठाकुरगंज विधानसभा सीट पर 2010 के चुनाव में लोजपा के नौशाद आलम विधायक चुने गये थे. उन्होंने जदयू तत्कालीन विधायक गोपाल अग्रवाल को हराया था. नौशाद बाद में लोजपा छोड़ जदयू में शामिल हो गये. अभी नीतीश सरकार में वह अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हैं. नौशाद आलम के जदयू में शामिल होने और उनके मंत्री बनने से पार्टी में अपना कद छोटा होते देख गोपाल अग्रवाल लोजपा में शामिल हो गये. उधर पूर्व भाजपा विधायक सिकंदर सिंह भी इस सीट पर नजर गड़ाये हुए हैं.
वह इन फिराक में बताये जाते हैं कि किशनगंज विधानसभा सीट से अगर उनकी पत्नी स्वीटी सिंह को भाजपा टिकट नहीं देती है, तो वह इस सीट पर अपनी दावेदारी पेश करेंगे. भाजपा में उनके अलावा और भी कई नेता टिकट की दावेदारी कर रहे हैं, लेकिन देखना यह होगा कि एनडीए में यह सीट किस दल के खाते में जाती है. पिछले चुनाव में लोजपा इस सीट से जीती थी और लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से भाजपा ने उम्मीदवार दिया था. इस चुनाव में भाजपा को इस विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस से करीब 10 फीसदी कम वोट मिले थे. लिहाजा इस सीट पर लोजपा का दावा स्वाभाविक माना जा रहा है.
भाजपा से अलग होने के बाद जदयू के वोट में यहां भारी गिरावट आयी. विधानसभा चुनाव में उसे जहां 22.18 फीसदी वोट मिले थे और वर दूसरे स्थान पर रहा था, वहीं लोकसभा चुनाव में उसे केवल 2.92 प्रतिशत वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर टिक पाया था. उसके प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गयी थी.
प्रमुख मुद्दे
ठाकुरगंज को अनुमंडल का दर्जा
नदियों के कटाव से विस्थापित हुए परिवारों का पुनर्वास
ग्रामीण इलाके में विद्युत व पाने के पानी की आपूर्ति
रोजगार के साधन.
अब तक
इस सीट से आठ बार कांग्रेस, एक बार जेएमपी, एक बार जनता दल, एक बार बीजेपी, एक बार एसपी व एक बार लोजपा जीती.
इन दिनों
भाजपा परिवर्तन की लहर पैदा करने में जुटी है. लोजपा ग्रस रूट पर सक्रिय है. महागंठबंधन की ताकत स्वाभिमान रैली में लगा है.
