हरगौरी मंदिर में मांगी मुराद होती है पूरी

आस्था. 117 वर्ष पुराना है ठाकुरगंज हरगौरी मंदिर का इतिहास मन्नतें व मुराद पूरी करते हैं भोलेनाथ ठाकुरगंज : श्री हरगौरी मंदिर से आज तक कोई भी भक्त खाली नहीं लौटा है. 117 साल पुराने हरगौरी मंदिर में भक्तों की आस्था इतनी ज्यादा है कि यहां सालों भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है और […]

आस्था. 117 वर्ष पुराना है ठाकुरगंज हरगौरी मंदिर का इतिहास

मन्नतें व मुराद पूरी करते हैं भोलेनाथ
ठाकुरगंज : श्री हरगौरी मंदिर से आज तक कोई भी भक्त खाली नहीं लौटा है. 117 साल पुराने हरगौरी मंदिर में भक्तों की आस्था इतनी ज्यादा है कि यहां सालों भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है और बाबा भक्तों की हर कामना को पूरी करते है. वहीं सावन में भक्तों का उत्साह चरम पर है. मंदिर में पुरोहित के रूप में कार्यरत पार्वती चरण गांगुली और जयंत गांगुली इस मंदिर के स्वर्णिम इतिहास का वर्णन करते हुए कहते है कि ठाकुर परिवार द्वारा मंदिर प्रांगण में लगी प्लेट के आधार पर यह प्रमाणित है कि 8 फरवरी 1901 से हरगौरी मंदिर में पूजा-अर्चना आरंभ हुई. वही इसके बाद स्व गनपत राम अग्रवाल, दिवंगत सुधीर लाहिड़ी,
भूतपूर्व आपूर्ति निरीक्षक रुद्रानन्द झा, फुलचन्द्र अग्रवाल ने इस मंदिर को भव्य रूप प्रदान किया. वर्ष 2001 में इस मंदिर के एक सौ वर्ष पूरा होने पर विशाल शताब्दी उत्सव भी मनाया गया था. सावन के दौरान यह मंदिर शिव भक्तों का डेरा बन जाता है. पुरोहित द्वय ने बताया कि सावन में शिवलिंग पर बेल-पत्र, दूध, दही, जल, घी, फूल आदि से पूजा की जाती है. सावन महीने में हजारों की संख्या में नगर एवं दूर दराज ग्रामीण क्षेत्रों सहित बंगाल व नेपाल के श्रद्धालु भी मंदिर में अवस्थित शिवलिंग में जलाभिषेक करने आते हैं.
मंदिर का है स्वर्णिम इतिहास
ठाकुरगंज का प्राचीन नाम कनकपुर था. वर्ष 1880 में राष्ट्रकवि रविंद्र नाथ ठाकुर के बड़े भाई सर ज्योतिन्द्र मोहन ठाकुर यहां रह रहे थे. तब से यह कनकपुर से ठाकुरगंज बन गया. वर्ष 1897 में ठाकुरगंज के पूर्वोत्तर कोण में टैगोर परिवार द्वारा अपने कार्यालय निर्माण के लिए की जा रही खुदाई के क्रम में एक फीट ऊंचा शिवलिंग मिला, जिसके आधा भाग में जगत जननी माता पार्वती की प्रतिमा अंकित है. इसे रविंद्र नाथ ठाकुर के वंशज कोलकाता में स्थापित करना चाहते थे और वे इसे वहां ले भी गये. परन्तु इस शिवलिंग को उसी जगह स्थापित करने का स्वप्न आने के बाद इसे कोलकाता से वापस लाकर बंगला संवत 21 माघ 1957 को स्थापित कर दिया गया. ठाकुर परिवार द्वारा नियुक्त पंडित स्व भोला नाथ गांगुली का परिवार आज भी इस मंदिर में पुजारी के रूप में कार्यरत है.
शिव के साथ मां पार्वती की भी है प्रतिमा
हरगौरी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर की विशेषता यहां मां पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा एक ही साथ है. यह शिवलिंग दुर्लभ माना गया है. वैसे भी देवाधिदेव महादेव को सबसे ज्यादा प्रिय मां पार्वती की प्रतिमा उनके साथ बहुत कम दिखती है. यह प्रतिमा जीवंत दिखाई देती है. जानकार बताते हैं कि ऐसी प्रतिमा कहीं और नहीं है. जहां मां पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा एक साथ अंकित हो. इसी कारण इस मंदिर का नाम श्री हरगौरी मंदिर पड़ा. इस शिवलिंग के दर्शन को देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां आते हैं.

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