किसानों को मिली गाजर घास के महत्व की जानकारी

खगड़िया : षि विज्ञान केंद्र द्वारा गुरुवार को कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला में भाग ले रहे किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक डॉ ब्रजेंदु ने बताया कि गाजर घास से मनुष्य, पशु व फसल को क्षति पहुंचती है. गाजर घास के कारण मनुष्य को खुजली सहित कई चर्म रोग हो जाते हैं. […]

खगड़िया : षि विज्ञान केंद्र द्वारा गुरुवार को कार्यशाला का आयोजन किया गया. कार्यशाला में भाग ले रहे किसानों को कृषि विज्ञान केंद्र के समन्वयक डॉ ब्रजेंदु ने बताया कि गाजर घास से मनुष्य, पशु व फसल को क्षति पहुंचती है. गाजर घास के कारण मनुष्य को खुजली सहित कई चर्म रोग हो जाते हैं. पशुओं में दूध की कमी के साथ साथ कई बीमारियां होती है. उन्होंने बताया कि खेत में लगी फसल का पैदावार भी गाजर घास के कारण कम होता है. यह घास बहुवर्षीय है खेत में अक्तूबर व नवंबर माह में सर्वाधिक होता है.

कैसी होती है गाजर घास : यह एक वर्षीय शाकीय पौधा है, जिसकी लंबाई लगभग 1 से 1.5 मीटर तक हो सकती है. इसका तना रोयेदार एवं अत्याधिक शाखायुक्त होता है. इसकी पत्तियां गाजर की पत्ती की तरह नजर आती है. प्रत्येक पौधा लगभग 10 हजार से 25 हजार अत्यंत सूक्ष्म बीज पैदा कर सकता है. गाजर घास के पौधे की लुगदी से हस्त निर्मित कागज एवं कम्पोजिट तैयार किये जा सकते है. बायोगैस उत्पादन में इसको गोबर के साथ मिलाया जा सकता है. गरीब व झोपाड़ियों में रहने वाले इसका प्रयोग ईंधन के रूप में भी करते हैं. गाजर घास को फूल आने से पहले उखाड़ कर बहुत अच्छा कम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है जिसमें पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा होती है.
नियंत्रण के उपाय : डॉ ब्रजेन्दु ने बताया कि गाजर घास का नियंत्रण फूल आने से पहले हाथ से उखाड़ कर जला देने एवं विभिन्न खरपतवारनाशियों जैसे एट्राजिन, एलाक्लोर, डाइयूरान, मेट्रीव्यूजिन, 2, 4-डी, ग्लाइफोसेट इत्यादि के प्रयोग से किया जा सकता है. गाजर घास के प्राकृतिक शत्रु मेक्सिकन बीटल भी इसके नियंत्रण में लाभप्रद है.
होने वाली हानियां
गाजर घास के लगातार संपर्क में आने से मनुष्यों में डरमेटाइटिस, एक्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा आदि जैसी बीमारियां हो जाती है. पशुओं के लिए यह गाजर घास अत्यधिक विषाक्त होता है. इसके खाने से पशुओं में अनेक प्रकार के रोग पैदा हो हैं एवं दुधारू पशुओं के दूध में कडुआहट के साथ दूध उत्पादन में भी कमी आ जाती है.
वैज्ञानिकों ने दी जानकारी
कार्यक्रम में केन्द्र के वैज्ञानिक मनोज कुमार राय, डॉ अनीता कुमारी, जितेन्द्र कुमार, डॉ सत्येन्द्र कुमार, प्रहलाद कुमार ने किसानों को जानकारी दी. केन्द्र के कार्यक्रम समन्वयक डॉ ब्रजेन्दु ने बताया कि गाजर घास जिसे पार्थेनियम, कांग्रेस घास, सफेद टोपी, छतक चांदनी, गांधी बूटी इत्यादि नामों से जाना जाता है. गाजर के पौधे की तरह दिखने वाला यह अत्यंत नुकसानदायक खरपतावर है.
कहां उगती है गाजर घास
गाजर घास पौधा हर तरह के वातावरण में उगने की अभूतपूर्व क्षमता रखता है. इसके बीज लगातार प्रकाश अथवा अंधकार दोनों ही परिस्थितियों में अंकुरित होते है. यह हर प्रकार की भूमि चाहे वह अम्लीय हो या क्षारीय, उग सकता है. बहुतायत रूप से गाजर घास के पौधे खाली स्थानों, सड़क के किनारे, रेलवे लाइनों आदि पर पाये जाते हैं.

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