बच्चों को समय से पहले बूढ़ा बना रहे स्मार्ट फोन

एम्स दिल्ली के चिकित्सक डॉ. निशात अहमद व डॉ आरोन हर्टमेन ने लिया संकल्प

– स्मार्ट फोन से दूर रहने के लिए चलेगा जागरूकता अभियान

– एम्स दिल्ली के चिकित्सक डॉ. निशात अहमद व डॉ आरोन हर्टमेन ने लिया संकल्प

खगड़िया. बच्चों को समय से पहले बूढ़ा बना रहे स्मार्ट फोन से दूर रहने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाएगा. दिल्ली एम्स के चिकित्सक डॉ निशात अहमद, डॉ आरोन हर्टमेन ने बिहार के सभी स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाया का निर्णय लिया. बच्चों को स्मार्ट फोन से हो रही हानि की रिपोर्ट बिहार सरकार को सौंपने का निर्णय लिया. खगड़िया के स्कूलों से जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया गया. सदर प्रखंड के जलकौड़ा निवासी एम्स के चिकित्सक डॉ निशात अहमद ने बताया कि स्मार्ट फोन बच्चों के शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास को दीमक की तरह चाट रहा है.

आंखों को नुकसान पहुंचा रही स्किन की ब्लू लाइट

मोबाइल बच्चों के आंखों को नुकसान पहुंचा रहा है. बच्चों की रातों की नींद गायब होने लगी है. देर रात तक स्किन से निकलने वाली ब्लू लाइट न केवल उनकी आंखों को नुकसान पहुंचा रही है. बल्कि उनके मस्तिष्क में मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) के चक्र को भी बिगाड़ रही है. यहीं कारण है कि जब नींद पूरी नहीं होती, तो अगले दिन की शुरुआत चिड़चिड़ेपन और एकाग्रता की कमी के साथ होती है. इसी का परिणाम है कि आजकल के बच्चों में साइकोलॉजिकल प्रेशर (मनोवैज्ञानिक दबाव) और एंग्जायटी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है. वे वास्तविक दुनिया के रिश्तों से कटकर आभासी दुनिया की लाइक्स और व्यूज में अपनी खुशी तलाश रहे हैं. उन्होंने कहा कि भारत में प्रति व्यक्ति औसतन पांच घंटे प्रतिदिन मोबाइल के संपर्क में रहते हैं. जिसके कारण गंभीर संकट सामने आ रहा है. जिसे छिपा हुआ जैविक चक्र कहा जाता है. अत्यधिक स्किन समय नींद में खलल डालता है. जिससे आंत के माइक्रोबायोम पर बुरा असर पड़ता है. जो न्यूरोइन्फ्लेमेशन को बढ़ावा देता है. मस्तिष्क की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को तेज करता है. उन्होंने कहा कि यह कोई प्रलय की भविष्यवाणी नहीं है. यह एक उभरता हुआ विज्ञान है. जो आपको अगली बार देर रात तक स्किन स्क्रॉल करने से पहले दो बार सोचने पर मजबूर कर सकता है.

याददाश्त व ध्यान में आती है भारी गिरावट

लगभग 72 प्रतिशत छात्र स्कूल के दिनों में आठ घंटे से कम सोते हैं, जिससे उनकी याददाश्त और ध्यान में भारी गिरावट आती है. प्रतिदिन 4 घंटे से अधिक स्किन टाइम नींद की कमी, ध्यान में बाधा और याददाश्त में कमी का कारण बनता है. डॉ निशात अहमद ने बताया कि आंतों का विद्रोह खराब नींद से माइक्रोबायोम को भारी नुकसान होता है. नींद के पैटर्न में गड़बड़ी आंतों के माइक्रोबायोटा के संतुलन को बिगाड़ देती है. जिससे डिस्बायोसिस हो जाता है. पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र के बीच संचार का दोतरफा मार्ग, आंत-मस्तिष्क अक्ष, प्रभावित हो जाता है. जिससे आंत द्वारा सेरोटोनिन का उत्पादन कम हो जाता है. जिसमें नींद, तनाव नियंत्रण और आंतों का कार्य शामिल है.

बढ़ती उम्र के साथ दिमाग का विकासः जब सूजन न्यूरॉन्स से टकराती है

न्यूरोइन्फ्लेमेशन के कारण दिमाग की बढ़ती उम्र को बढ़ाने वाली प्रक्रिया, जिसे इफ्लेमेजिंग कहते हैं, कई तरीकों से अवसाद, चिंता और संज्ञानात्मक गिरावट का कारण बनती है. स्किन पर लंबे समय तक कृत्रिम प्रकाश के संपर्क में रहने से होने वाली डिजिटल मोटापा एक नई समस्या है. पेट का माइक्रोबायोम, जो इन सूजन का कारण बनता है. जन्मतिथि की परवाह किए बिना, आपके शरीर की उम्र को आंशिक रूप से निर्धारित कर सकता है.

निष्कर्षः बदलाव संभव है

मानव शरीर की तनाव प्रतिक्रिया वर्षों में नहीं बदली है. स्मार्टफोन का अनियंत्रित उपयोग राष्ट्रीय स्वास्थ्य के लिए एक छिपा हुआ खतरा है. इसलिए अपने शरीर के संकेतों को सुने और मस्तिष्क को आवश्यक समय दें. लगातार कई घंटों तक स्किन देखने के बाद आप कैसा महसूस करते हैं. इस पर ध्यान दें और बदलाव लाएं. आपका फोन एक उपकरण है, इसे जीवन रेखा बनने के लिए नहीं बनाया गया था. ध्यान केंद्रित करने की इस होड़ में आपके मस्तिष्क को नुकसान नहीं होना चाहिए. इसलिए आज, जब आपको स्क्रॉल करने का मन करे, तो खुद से पूछें, क्या यह रात की नींद, पाचन तंत्र और सुबह के सुस्ती को बर्बाद करने लायक है.

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By RAJKISHORE SINGH

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