खगड़िया: जिले के लोग प्रतिदिन दस लाख रुपये का गुटखा खाकर सिर्फ थूक दिया करते हैं. ये बात सरकारी आंकड़ा बोल रहा है. यह काफी गंभीर विषय है. घर में खाने को पूरे या न पूरे रिक्शा चालक से लेकर संभ्रांत परिवार के लोग गुटका खाते हैं. जबकि इससे शरीर के साथ-साथ शहर को भी व्यापक नुकसान हो रहा है.
शहर में गुटखा खाकर थूकने से गंदगी होती है सो अलग, मुंह का स्वाद तो बिगड़ता ही है लोग कैंसर जैसे घात रोग को भी आमंत्रण देते हैं, लेकिन इससे सर्तकता बरतने का कोई उपाय नहीं कर पाते हैं. बाजार में विभिन्न प्रकार के गुटखे की बिक्री होती है. इसमें फिलवक्त सबसे कम दाम का गुटखा पांच रुपये का आता है. अधिक कीमत रजनीगंधा और तुलसी का 18 रुपये पड़ता है. प्रतिदिन लोग एक लाख 86 हजार पुड़िया खा रहे हैं. ऐसे में अगर निचले स्तर से ही जोड़ा जाये तो दस लाख रुपये का गुटखा लोग रोज खा जाते हैं.
रोक लगाने और हटाने पर बढ़ा दिया जाता है दाम
इन सभी बातों के बीच एक पहलू यह भी है कि सरकार द्वारा रोक लगाने और हटाने के बीच इसका पूरा मुनाफा इसके निर्माण से जुड़े कंपनी के लोग उठाते हैं. रोक लगाते ही गुटखा का दाम बढ़ा दिया जाता है. दाम बढ़ने के बाद भी लोग इसके सेवन से परहेज नहीं करते हैं.
बीमारी का खतरा
अधिकतर कम उम्र के लोग गुटका का सेवन कर रहे हैं. यह विशेष केमिकल तथा सड़ा गला कसैली(सुपाड़ी), खजुर के बीज से तैयार किया जाता है. इसे खाने से कैंसर के रोग पकड़ने की अति संभावना होती है. गुटका का पाउंडर फेफरा पर जम जाने के कारण लीवर में कमजोरी होने के कारण उसे भूख नहीं लगना, पैखाना में कब्ज होना, मुंह में पायरिया होना बड़े बीमारी होने का लक्षण है. चिकित्सक प्रेम कुमार ने बताया कि सबसे पहले तो गुटका खाना ही नहीं चाहिए. अगर लोग खाते हे तो शाम में नीम के दातुन से दांत के बीच गुटका का दाना फंसा हुआ नहीं रह सके. उन्होंने बताया कि गुटका खाने के पहले आधा लीटर पानी भी पीने की बीमारी होने की संभावना कम हो जाती है.
कितना मिलता है टैक्स
वाणिज्य कर सहायक आयुक्त रामाकांत सिंह ने बताया कि जिले के कुल सात गुटका के थोक विक्रेता हैं. इन सभी थोक विक्रेताओं के द्वारा प्रतिवर्ष 58 लाख 31 हजार 855 रुपया जिला को टैक्स अदा करती है. इन सभी थोक विक्रेताओं के द्वारा विभिन्न तरह के गुटखा का बिक्री किया जाता है. उन्होंने बताया कि ये सात थोक विक्रेताओं के अलावा जिले में 54 मध्यम वर्गीय थोक विक्रेताओं को कंपाउंड निबंधन निर्गत किया गया है. जो राज्य के अंदर 40 लाख प्रति वर्ष खरीद बिक्री पर प्रति वर्ष 10 हजार रुपये का टैक्स विभाग को अदा करती है.
कहते हैं लोग
जिले के कई वृद्ध व समाजसेवी सुभाष चंद्र जोशी, किरण देव यादव, नागेंद्र सिंह त्यागी, बाबू लाल शौर्य, सुमित कुमार आदि ने बताया कि गुटका जान लेवा है. इसे खाने से कई प्रकार की बीमारी होने की संभावना रहती है. सरकार यदि गुटका पर रोक लगा दे तो 12 वर्ष उम्र से लेकर 30 वर्ष उम्र के लड़का बीमारी से ग्रसित होने से वंचित रह सकता है.
प्रतिदिन 1000 बोरी गुटका की है खपत
जिले के प्रतिदिन मधु गुटका का बिक्री 1000 बोरी है. एक बोऱी में 200 पैकेट और एक पैकेट में 25 पुड़िया रहता है. इसी तरह रजनीगंधा 100 पेटी, एक पेटी में 60 पैकेट, शिखर 10 बोड़ी, एक बोड़ी में 200 पैकेट और एक पैकेट में 28 पुड़िया, सिमला गुटका प्रतिदिन 56 हजार पुड़िया का बिक्री किया जाता है. उन्होंने बताया कि छोटे तथा बड़े व्यवसायियों को धड़ पकड़ के लिए अभियान चलाया जाता है. उन्होंने बताया कि विभिन्न तरह के गुटका का निर्माण उत्तरप्रदेश में किया जाता है. और जिले के व्यवसायी वहीं से खरीदारी करते है.
