कटिहार शहर के बड़ा बाजार स्थित माता शीतला के मंदिर मे श्री शीतलाष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया गया. इस अवसर पर मंदिर को बड़े ही आकर्षक ढंग से सजाया गया. शीतला मंदिर मे भक्तों ने प्रातः मे पूजा अर्चना की. भक्तों ने पहले अपने घर पर एक दिन पूर्व ही भोजन (प्रसाद) बनाकर दूसरे दिन प्रातः मंदिर आकर माता शीतला जी को ठंडे भोजन (प्रसाद) का भोग लगाया व शीतल जल चढ़ाया. माता को भोग में मीठी पकोड़ी, फीकी पकोड़ी, मीठा भात, दही, राबड़ी एवं बाजरा का भोग लगाया जाता है. होली के आठवें दिन शीतलाष्टमी का पर्व बासोड़ा मनाया जाता है. इस पर्व का काफी महत्व है. मां शीतला देवी की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष के अष्टमी तिथि को होती है. पूरे विधिविधान से सप्तमी को ही श्रद्धालु अपने घर पर भोग बनाते है एवं अष्टमी को ही श्रद्धालु इसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करते है. अष्टमी के दिनभर भक्त अपने घर पर ठंडा बासी भोजन करते है. मां शीतला को शीतल जल चढ़ा कर श्रद्धालु उस जल को अपने अंग, आंखों में लगाकर एवं अपने घरों मे जल का छिड़काव करते है एवं माता का आशीर्वाद मांगते है. ताकि साकरात्मक ऊर्जा घर मे प्रवेश कर सके. श्री शीतला माता को अत्यंत शीतल माना जाता है. कहा जाता है ये कष्ट रोग हरने वाली माता है. इनकी सवारी गधा है. पौरणिक मान्यता है कि शीतला माता चतुर्भुजी है. इनके हाथ मे कलश, सुप, नीम के पत्ते और झाड़ू होती है. ऐसी मान्यता है कि झाड़ू से दरिद्रता दूर होती है और कलश से धन कुबेर का वास होता है. इनकी अराधना विशेष कर गर्मी के मौसम मे की जाती है. स्कंद पुराण मे माता शीतला का वर्णन मिलता है. जिसमें उन्हें चेचक, खसरा और हैज़ा जैसी संक्रामक बीमारियों से बचाने वाली माता बताया गया है. माता शीतला अग्नि तत्व की विरोधी है. यही कारण है कि इस दिन घरों मे चूल्हा नही जलता है कोई भी शीतलाष्टमी के दिन गरम कुछ भी नही खाते है और भोजन को एक दिन पहले ही तैयार किया जाता है. शीतलाष्टमी का पर्व एक मात्र ऐसा पर्व है. जिसमें बासी भोजन चढ़ाया और खाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि शीतलाष्टमी के दिन से ही मौसम तेजी से गर्म होने लगता है. शीतला माता जी के स्वरूप को शीतलता प्रदान करने वाला कहा गया है.
परंपरागत तरीके से मनाई गयी श्री शीतलाष्टमी पर्व
परंपरागत तरीके से मनाई गयी श्री शीतलाष्टमी पर्व
