केलांचल में सिमट रही केले की खेती, गलवा रोग और प्राकृतिक आपदाओं ने तोड़ी किसानों की कमर

कभी समृद्धि का प्रतीक रहा कटिहार का "केलांचल" अब गंभीर संकट से गुजर रहा है. प्राकृतिक आपदाएं और गलवा रोग किसानों की कमर तोड़ रहे हैं, जिससे केले की खेती का रकबा लगातार घट रहा है.

Katihar Banana Farming Crisis: कुरसेला (कटिहार). कभी उत्तर बिहार में खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक मानी जाने वाली केले की खेती अब संकट के दौर से गुजर रही है. कटिहार के कुरसेला, समेली, फलका, बरारी और कोढ़ा सहित कई प्रखंडों में फैला केलांचल क्षेत्र अब अपनी पुरानी पहचान खोता जा रहा है. प्राकृतिक आपदाओं, पौधों में फैलने वाले गलवा रोग और बढ़ती लागत ने किसानों को केले की खेती से दूरी बनाने पर मजबूर कर दिया है.

तीन दशक पहले तरक्की की पहचान बना था केलांचल

करीब 30 वर्ष पहले इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर केले की खेती शुरू हुई थी. हजारों एकड़ भूमि पर फैले केले के बागानों ने पूरे इलाके को "केलांचल" की पहचान दिलाई. देश के विभिन्न राज्यों के बड़े व्यापारी खेतों तक पहुंचकर केले की खरीद करते थे. इससे किसानों की आय बढ़ी, हजारों लोगों को रोजगार मिला और क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिली.

बाढ़, आंधी और ओलावृष्टि ने पहुंचाया भारी नुकसान

वर्ष 1987, 1998 और 2016 की भीषण बाढ़ ने केले की खेती को गहरा नुकसान पहुंचाया. इसके बाद लगातार आंधी, ओलावृष्टि और अन्य प्राकृतिक आपदाओं ने किसानों की कमर तोड़ दी. बार-बार फसल नष्ट होने से किसानों का आर्थिक नुकसान लगातार बढ़ता गया.

गलवा रोग ने खत्म कर दी उम्मीद

पिछले लगभग दस वर्षों में गलवा रोग केले की खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आया. इस बीमारी ने बड़ी संख्या में पौधों को नष्ट कर दिया. किसानों ने कई उपाय किए, लेकिन फसल को बचाने में सफलता नहीं मिली. इससे केले की खेती का रकबा लगातार घटता चला गया.

बढ़ती लागत से किसान हुए परेशान

रासायनिक खाद, डीजल, सिंचाई और मजदूरी की लागत बढ़ने से केले की खेती पहले की तुलना में काफी महंगी हो गई है. दूसरी ओर बाजार में उचित मूल्य नहीं मिलने से किसानों को लागत के अनुरूप लाभ नहीं मिल पा रहा है. लगातार घाटा होने के कारण अधिकांश किसानों ने केले की खेती छोड़ दी है.

अब दूसरी नकदी फसलों की ओर बढ़ रहे किसान

Katihar Banana Farming Crisis: केले की खेती छोड़ने के बाद किसान अब मक्का, पटुआ और मखाना जैसी नकदी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. हालांकि केलांचल के कुछ सीमित क्षेत्रों में अभी भी केले की खेती हो रही है, लेकिन पहले जैसी हरियाली और रौनक अब दिखाई नहीं देती. किसानों का मानना है कि यदि सरकार की ओर से रोग नियंत्रण, तकनीकी सहायता और उचित बाजार उपलब्ध कराया जाए तो केले की खेती को फिर से नई पहचान मिल सकती है.


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लेखक के बारे में

By अजीत ठाकुर

अजीत ठाकुर प्रिंट माध्यम में 28 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. कुरसेला (कटिहार) क्षेत्र में काम कर रहे हैं. सामाजिक कार्यों, शिक्षा, राजनीति व खेल में रुचि रखते हैं.

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