कटिहार के फलका से अली अहमद की रिपोर्ट
Bamboo Farming: कटिहार जिले के फलका प्रखंड के किसानों ने अपनी तकदीर और कृषि के तौर-तरीकों को बदलने की दिशा में एक अनूठी और सफल पहल की है. कभी बड़े पैमाने पर केले की खेती के लिए मशहूर रहे इस क्षेत्र के छोटे-बड़े किसान अब केले को छोड़कर बांस की खेती के जरिए अपनी जिंदगानी संवार रहे हैं. क्षेत्र के किसानों के लिए इन दिनों बांस की नगदी फसल एक बड़ा वरदान साबित हो रही है. इस खेती से होने वाली बंपर आमदनी के जरिए किसान न केवल अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, बल्कि अपने बच्चों को उच्च शिक्षण संस्थानों में अच्छी तालीम भी दिला रहे हैं.
पीलिया रोग ने तोड़ी थी कमर, अब ‘ग्रीन बैंक’ बना सहारा
किसानों का केला खेती से विमुख होकर बांस की ओर आकर्षित होने के पीछे मुख्य व्यावहारिक और आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं:
- बीमारी की मार: पिछले कुछ वर्षों से फलका प्रखंड में केले की फसल पर ‘पीलिया रोग’ (Panama Wilt/Yellowing Disease) का भारी प्रकोप देखा जा रहा था. इससे पूरी की पूरी फसल बर्बाद हो जाती थी और किसान कर्ज के दलदल में डूब रहे थे.
- किसानों का खजाना: जानकार युवा किसान अमित वत्सल, अफरोज आलम, खगेश मंडल, आज़ाद आलम और साजिद आलम बताते हैं कि बांस की खेती किसी सरकारी बैंक से कम नहीं है. बुरे वक्त में जब भी पैसों की सख्त जरूरत होती है, किसान तुरंत इसकी तुड़ाई कर बाजार में इसे भुना सकते हैं.
- आकर्षक बाजार भाव: वर्तमान समय में स्थानीय बाजार और बाहरी मंडियों में एक अच्छे बांस की कीमत ₹150 से ₹200 प्रति बांस तक मिल रही है, जिसमें लागत बेहद कम है.
शादी-ब्याह से लेकर उद्योगों तक मांग, हाड़ी समुदाय को मिला रोजगार
बहुउपयोगी है बांस: बांस की उपयोगिता जन्म से लेकर मृत्यु तक है. हिंदू रीति-रिवाजों में शादी-विवाह के मंडप से लेकर दाह-संस्कार तक, और निर्माण क्षेत्र में फुस के घर से लेकर नवनिर्मित बड़े भवनों की सेंट्रिंग (Scaffolding) में बांस की भारी मांग रहती है.
स्थानीय स्तर पर बांस के जरिए कुटीर उद्योगों को भी नई जान मिली है:
- पारंपरिक कला को बढ़ावा: शादी-विवाह के सीजन में बांस से बनने वाली खूबसूरत रंग-बिरंगी टोकरियां, सूप और हाथ के पंखे बनाकर स्थानीय कई परिवार अपनी जीविका चला रहे हैं.
- हाड़ी समुदाय का मुख्य जरिया: क्षेत्र के ‘हाड़ी समुदाय’ के लिए यह हुनर उनके मुख्य व्यवसाय में शुमार है, जिससे उन्हें गांव में ही सतत रोजगार मिल रहा है.
- टहनियों से भी कमाई: मुख्य बांस के अलावा उसकी टहनियां (करची) भी ₹50 से ₹70 प्रति बोझा (गठरी) की दर से बिकती हैं, जिसका उपयोग ग्रामीण और मजदूर घरों की टाटी (बाड़) बनाने में करते हैं.
दिल्ली, यूपी और एमपी की मंडियों में भारी मांग, उद्यान विभाग दे रहा कोपल
फलका प्रखंड की मिट्टी में उपजे बांसों की गुणवत्ता इतनी बेहतरीन है कि बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश के बड़े व्यापारी ट्रकों में माल लोड कराकर ले जा रहे हैं. कई प्रगतिशील किसानों ने कृषि को आधुनिक बनाने के लिए उद्यान विभाग (Horticulture Department) से सरकारी अनुदान पर बांस के उन्नत कोपल (पौधे) लेकर वैज्ञानिक तरीके से इसकी फार्मिंग शुरू की है, जिसने किसानों की माली हालत (आर्थिक स्थिति) को पूरी तरह बदल दिया है.
सरकारी प्रोत्साहन मिले तो बनेगी मिसाल: कृषि पदाधिकारी सौरव कुमार
बांस की खेती अब फलका प्रखंड में एक सुव्यवस्थित और बड़े कमर्शियल बिजनेस का रूप लेती जा रही है. स्थानीय किसानों की मांग है कि सरकार और जिला प्रशासन यदि इसके प्रोसेसिंग यूनिट और विस्तार के लिए विशेष प्रोत्साहन दे, तो यह आत्मनिर्भरता की एक बड़ी मिसाल बन सकता है.
प्रखंड कृषि पदाधिकारी सौरव कुमार का बयान:
इस संदर्भ में जानकारी देते हुए फलका के कृषि पदाधिकारी सौरव कुमार ने बताया कि बिहार सरकार के उद्यान विभाग द्वारा फलका प्रखंड के कई किसानों को बांस की खेती योजना के तहत सीधे तौर पर लाभान्वित किया गया है. उन्होंने क्षेत्र के अन्य कृषकों से अपील करते हुए कहा कि जो भी किसान पारंपरिक खेती से हटकर बांस की खेती से जुड़ना चाहते हैं और सरकारी सब्सिडी का लाभ लेना चाहते हैं, वे ब्लॉक मुख्यालय स्थित कृषि कार्यालय में अपना आवेदन दे सकते हैं, ताकि नियमानुसार सभी को इसका लाभ दिया जा सके.
