नौका हादसा बनी नियती, जान जोखिम में डाल करते हैं लोग नाव की सवारी
कटिहार : कोसी और सीमांचल के जर्रे-जर्रे में जीवट मानव सभ्यता समायी हुई है. शायद यही कारण है कि यहां के लोग सहनशील होने के साथ साथ उतने महत्वाकांक्षी नहीं हो पाये कि उन्हें आधुनिक आबोहवा की चादर लपेटे में ले सके. एक लिहाज से यह प्रवृत्ति सही भी है लेकिन आधुनिक सामाजिक परिवेश के परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह सहनशीलता बेशक हमें आधुनिक रेस से कहीं दूर बैकफुट पर ले जाती है. इसका फायदा हमारे सफेदपोश से लेकर प्रशासनिक अमला तक उठाते हैं. बुनियादी सुविधाएं तक नसीब होती लेकिन लोग मजे में जीते हैं, सड़कें नहीं होती लेकिन लोग हिचकोले भरे रास्ते से होकर अपने काम को अंजाम देते हैं, बिजली नहीं होती लेकिन किसान अपनी जेबें ढीली कर खेतीबारी करते हैं, पानी नहीं होती लेकिन लोग पेयजल के लिये कभी उग्र प्रदर्शन नहीं करते.
हादसे को नहीं लेते गंभीरता से
सब चलता है…की तर्ज पर सब कुछ भूलने की आदत सी पड़ गयी है. इसी का फायदा हमारे मुखिया मसलन सफेदपोश और प्रशासनिक अमला उठाते हैं. इसी कड़ी में हम बात करेंगे नदियों में बह रही जिंदगी की. हरेक साल बरसाती मौसम हो या फिर सूखे का मौसम नदियां कई जिंदगानी लील रहीं हैं. इसे प्रशासनिक उपेक्षा कहें या फिर लापरवाही नाव हादसे को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता है. कोसी नदी हो या फिर गंगा मौत का तांडव अमूमन हरेक साल मचता है.
आश्वासन की पिलायी जाती है घुट्टी
चित्कार के बीच कुछ देर के लिये सांत्वना और आश्वासनों की घुट्टी पिलायी तो जाती है लेकिन बदलता कुछ भी नहीं है. विकास की दरिया बहाने की बात तो कही जाती है लेकिन इतने वर्ष बीतने के बाद भी जिले के लोगों को एक अदद पुल नसीब नहीं हुई. सैंकड़ों परिवार के सदस्य नाव हादसे का शिकार हो चुके हैं लेकिन प्रशासनिक तंद्रा है कि टूटती नहीं.
न तो नाव संचालन पर नियंत्रण है और न ही नाव पर सवार होने वाले भीड़तंत्र पर. परिणाम यह होता है कि जिंदगियां नदी में उसी तरह बह जाती ेंहैं जिस तरह हमारे सफेदपोश विकास की दरिया बहा देने की बात करते नहीं थकते. यही कारण है कि एक के बाद से एक घटनाएं होती जा रही हैं.
