दुर्गावती का ऐतिहासिक ''लोहवा पुल'' बदहाल, उपेक्षा के कारण अस्तित्व पर संकट

बिना पिलर के धनुषाकार बना है ब्रिटिशकालीन पुल, रखरखाव न होने से सड़क पर उभरे गड्ढे

बिना पिलर के धनुषाकार बना है ब्रिटिशकालीन पुल, रखरखाव न होने से सड़क पर उभरे गड्ढे कभी कंपन के कारण ”झुलवा पुल” के नाम से था मशहूर, अब रंगरोगन व मरम्मत की दरकार दुर्गावती. स्थानीय मुख्यालय बाजार स्थित नदी मार्ग पर वर्षों पूर्व बनायी गयी पुल रखरखाव के अभाव का दंश झेल रहा है. इस पुल पथ पर जगह-जगह गड्ढे उभर आये हैं. जानकारी के अनुसार यह पुल ब्रिटिश काल का बताया जाता है. इस पुल में सुरक्षा की दृष्टि से अधिकतर लोहे के पाइप लगाये गये हैं. इसकी इंद्रधनुषाकार मोटी ढलाई आज भी अपनी गुणवत्ता दर्शाती नजर आती है, लेकिन रंग-रोगन व देखरेख के अभाव में यह धीरे-धीरे बर्बाद हो रहा है. खासियत यह है कि इसके दोनों किनारों को छोड़कर नदी के बीच में सपोर्ट के लिए एक भी पिलर नहीं दिया गया है. पुलिया में कुछ जगहों पर पाइप गायब दिखते हैं. इसमें लगे लोहे के कारण क्षेत्रवासी इसे ‘लोहवा का पुल’ भी कहते हैं. इसकी खासियत यह रही है कि इस पुल पर अब तक कोई बड़ी सड़क दुर्घटना नहीं हुई है. इस पुल की सबसे बड़ी विशेषता इसका इंद्रधनुषाकार स्वरूप है. हावड़ा ब्रिज की तर्ज पर बने इस पुल के दोनों किनारों को छोड़कर नदी के बीच में सपोर्ट के लिए एक भी पाया (पिलर) नहीं दिया गया है. सुरक्षा के लिए इसमें लोहे के पाइपों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया गया है, जिसके कारण क्षेत्रवासी इसे ”लोहवा के पुल” के नाम से भी पुकारते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि आज के दौर में बन रहे नये पुलों की तुलना में इसकी गुणवत्ता कहीं अधिक श्रेष्ठ है. झुलवा पुल की यादें और वर्तमान संकट बुजुर्गों की मानें तो एक समय था जब इस पर से वाहन गुजरते थे, तो यह हल्का जंप (कंपन) किया करता था. इसी रोमांच के कारण बच्चे व युवा इसे ”झुलवा पुल” भी कहते थे. हालांकि, अब वह कंपन महसूस नहीं होता. बारिश के समय पुल पर बने गड्ढों में जलजमाव हो जाता है, जिससे दुर्घटना की आशंका बनी रहती है. जल निकासी की कोई सुदृढ़ व्यवस्था नहीं है. रखरखाव के अभाव में यह पुलिया उपेक्षा का शिकार हो रही है. ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो यह ऐतिहासिक पुल क्षतिग्रस्त हो सकता है. क्या कहते हैं लोग — 72 वर्षीय चंद्रदेव यादव ने बताया कि यह पुल उनके बचपन से है और ब्रिटिश काल में बना बताया जाता है. इसके रखरखाव की जरूरत है. –डहला के रामाशंकर ने कहा कि नदी के बीच बिना पिलर के बना यह पुल अपनी अनोखी बनावट के लिए जाना जाता है, लेकिन मरम्मत आवश्यक है. — सावठ पंचायत के पूर्व मुखिया मकसूद अली ने कहा कि लोहे के पाइप लगे होने के कारण इसे ‘लोहवा का पुल’ कहा जाता है. इसकी इंद्रधनुषाकार बनावट आकर्षण का केंद्र है, लेकिन अब यह उपेक्षा का शिकार है. ग्रामीणों ने प्रशासन से जल्द मरम्मत, रंग-रोगन व जल निकासी व्यवस्था दुरुस्त करने की मांग की है.

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By VIKASH KUMAR

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