जमुई जिले के सुदूर जंगली और अति नक्सल प्रभावित क्षेत्र गुरमाहा और चोरमारा की बेटियों ने शिक्षा के माध्यम से विकास की नई राह चुन ली है. कभी हिंसा और भय के लिए पहचाने जाने वाले इन इलाकों में अब पढ़ाई, सांस्कृतिक गतिविधियों और देशभक्ति की आवाज सुनाई दे रही है. समग्र सेवा संस्था, जिला प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों के लगातार प्रयास से क्षेत्र की बेटियां शिक्षा की मुख्यधारा से जुड़ रही हैं. इसी बदलाव का परिणाम है कि तीन बेटियां अपने परिवार की पहली पीढ़ी के रूप में मैट्रिक परीक्षा पास करने में सफल हुई हैं.
गांव में शुरू हुई पढ़ाई ने बदली बेटियों की राह
समग्र सेवा संस्था की ओर से वर्षों पहले क्षेत्र में शिक्षा को लेकर पहल शुरू की गई थी. बच्चों को उनके गांव में ही पढ़ने का अवसर देने के लिए निरंतर शिक्षण केंद्र चलाए गए. बच्चों को पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराने के साथ नजदीकी विद्यालयों से भी जोड़ा गया. धीरे-धीरे ग्रामीण परिवारों में शिक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ी और बेटियों ने भी पढ़ाई को अपने भविष्य का रास्ता बनाना शुरू किया.
जिला मुख्यालय के मंच पर पहली बार दिखाया हुनर
80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर गुरमाहा और चोरमारा की 12 बेटियों ने पहली बार जमुई जिला मुख्यालय में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. सुदूर जंगल क्षेत्र से निकलकर जिला स्तर के मंच पर पहुंची इन बेटियों ने शानदार प्रस्तुति दी. उनकी प्रस्तुति ने जिला प्रशासन और कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान आकर्षित किया. बेटियों के लिए यह सिर्फ सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि बदलते माहौल और बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक भी रही.
हर महीने मिलेगा आर्थिक सहयोग
बच्चियों की पढ़ाई आर्थिक परेशानी के कारण बीच में न छूटे, इसके लिए समग्र सेवा संस्था की ओर से 12 बेटियों को भोला मांझी इडीयू फेलोशिप से सम्मानित किया गया. फेलोशिप के तहत बच्चियों को प्रत्येक माह आर्थिक सहयोग दिया जाएगा. संस्था के कार्यकर्ता मकेश्वर ने कहा कि विकास का सबसे स्थायी औजार शिक्षा है. बच्चों की शिक्षा जारी रखने के लिए संस्था हरसंभव सहयोग करती रहेगी.
पहली पीढ़ी की बेटियों ने पास की मैट्रिक
गुरमाहा और चोरमारा की तीन बेटियों का अपने परिवार की पहली पीढ़ी के रूप में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करना क्षेत्र के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. जिन परिवारों में उच्च शिक्षा तक पहुंच बेहद सीमित रही, वहां बेटियों का मैट्रिक पास करना आने वाली पीढ़ियों के लिए नई उम्मीद पैदा कर रहा है.
‘मैं भी छू सकती हूं आकाश’ का बढ़ा विश्वास
फेलोशिप मिलने के बाद बच्चियों के चेहरे पर खुशी और आत्मविश्वास साफ दिखाई दिया. उन्होंने आगे पढ़ाई जारी रखने और अपने गांव व समाज का नाम रोशन करने का संकल्प लिया. बच्चियों ने उत्साह के साथ कहा, “मैं भी छू सकती हूं आकाश, मुझे मौके की तलाश है. मैं पढ़ती हूं तो देश पढ़ता है.”
शिक्षा से बदल रही जंगल क्षेत्र की तस्वीर
राजेश, काजल, संगम, अविनाशी, जितेंद्र सहित अन्य लोगों ने बच्चियों का उत्साह बढ़ाया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की. गुरमाहा और चोरमारा की बेटियों का बढ़ता आत्मविश्वास अब पूरे क्षेत्र में बदलाव की नई तस्वीर पेश कर रहा है. शिक्षा की यह रोशनी न केवल बेटियों के भविष्य को संवार रही है, बल्कि उन गांवों की नई पहचान भी गढ़ रही है, जहां कभी विकास की राह बेहद कठिन मानी जाती थी.
