जमुई के बरहट प्रखंड के खादीग्राम स्थित राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय की स्थिति सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े कर रही है. अंग्रेजी शासनकाल के पुराने भवन में संचालित यह अस्पताल बरसात में खुद बीमार नजर आता है. छत से पानी टपकने के कारण चिकित्सक और मरीज परेशान हैं, वहीं दवाइयों और उपकरणों के भी खराब होने का खतरा बना हुआ है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि अस्पताल में फिलहाल सिर्फ चिकित्सक निधि कुमारी तैनात हैं. फार्मासिस्ट, कंपाउंडर, सफाईकर्मी और अन्य कर्मचारियों के पद खाली हैं.
बारिश में टपकती छत, दवाइयों पर मंडरा रहा खतरा
बरसात शुरू होते ही अस्पताल के कमरों में छत से पानी टपकने लगता है. फर्श पर पानी जमा होने से मरीजों को परेशानी होती है. वहीं दवाइयों और स्वास्थ्य उपकरणों के भी क्षतिग्रस्त होने की आशंका बनी रहती है. पुराने भवन की स्थिति देखकर मरीजों और उनके परिजनों में भी चिंता रहती है.
एक डॉक्टर के भरोसे अस्पताल की पूरी व्यवस्था
अस्पताल में चिकित्सक निधि कुमारी के अलावा फिलहाल कोई नियमित कर्मचारी नहीं है. फार्मासिस्ट, कंपाउंडर और सफाईकर्मी की तैनाती नहीं होने के कारण अस्पताल की पूरी व्यवस्था एक डॉक्टर के भरोसे चल रही है. मरीजों का उपचार करने के साथ-साथ अस्पताल से जुड़ी अन्य जिम्मेदारियां भी चिकित्सक को ही संभालनी पड़ती हैं.
बिजली जाते ही इलाज में बढ़ जाती है परेशानी
अस्पताल में बिजली की समुचित व्यवस्था भी नहीं है. बिजली गुल होते ही कमरों में अंधेरा छा जाता है और एलईडी बल्ब की रोशनी में मरीजों का इलाज करना पड़ता है. आपात स्थिति में वैकल्पिक रोशनी की व्यवस्था नहीं होना स्वास्थ्य केंद्र की बड़ी कमी मानी जा रही है.
अस्पताल का अपना भवन नहीं होने के कारण विभाग की ओर से उपलब्ध कराये गये कई उपकरण भी एक कमरे में रखे हुए हैं. महिला और मरीजों की सुविधा के लिए भेजे गये उपकरणों का समुचित इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.
पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाएं भी नदारद
अस्पताल में मरीजों और उनके परिजनों के लिए शुद्ध पेयजल और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं. इसके बावजूद प्रतिदिन करीब 10 से 15 मरीज यहां उपचार कराने पहुंचते हैं. गठिया, साइटिका और जोड़ों के दर्द समेत कई बीमारियों से परेशान ग्रामीण आयुर्वेदिक उपचार के लिए इसी केंद्र पर निर्भर हैं.
अंग्रेजी शासन की विरासत, आज उपेक्षा का शिकार
स्थानीय लोगों के अनुसार, अंग्रेजी शासन के दौर में महिला चिकित्सक मेरी कॉम यहां ग्रामीणों का उपचार करती थीं. अंग्रेजों के जाने के बाद यह केंद्र आयुर्वेदिक अस्पताल के रूप में संचालित होने लगा. वर्षों पुराना यह अस्पताल आज भी ग्रामीणों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी बदहाल स्थिति सरकारी उपेक्षा की तस्वीर पेश कर रही है.
पेड़-पौधों के कारण छत पर जमा हो रहा पानी : अधिकारी
जिला आयुर्वेदिक चिकित्सा पदाधिकारी खुरर्शिया तलक ने बताया कि अस्पताल भवन की हाल ही में मरम्मत करायी गयी थी. छत के ऊपर पेड़-पौधों के पत्ते आने और जल निकासी बाधित होने के कारण बारिश का पानी जमा हो जाता है, जिससे छत से पानी टपकने की समस्या उत्पन्न हो रही है. उन्होंने बताया कि अस्पताल में आवश्यक संसाधनों और कर्मचारियों की कमी के संबंध में विभाग को लिखित रूप से अवगत कराया गया है.
