ठेकेदार का हथुआ स्थित पैतृक घर .

विधवा को विकलांग बेटे का है सहारा गरीबी में जीने को बेबस परिवार दाने-दाने को है मुहताज बरौली : जब किस्मत ठुकराती है, तो आदमी के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं. वह तिल-तिल कर जीने को विवश हो जाता है. कुछ यही हाल है मुसम्मात शांति और मुसम्मात माला का. इन्हें जब किस्मत ने […]

विधवा को विकलांग बेटे का है सहारा

गरीबी में जीने को बेबस परिवार दाने-दाने को है मुहताज
बरौली : जब किस्मत ठुकराती है, तो आदमी के सारे रास्ते बंद हो जाते हैं. वह तिल-तिल कर जीने को विवश हो जाता है. कुछ यही हाल है मुसम्मात शांति और मुसम्मात माला का. इन्हें जब किस्मत ने ठुकराया तो सरकारी मरहम भी न लग पाया है. नवादा पंचायत के माड़नपुर गांव में दो बेवा विकलांग बेटे के साथ गरीबी की मार झेल रही हैं. शांति कुंवर के पति मुसाफिर सिंह का 20 वर्ष पहले देहांत हो गया. वहीं, माला कुंवर के पति विनोद सिंह दो–-तीन वर्ष पूर्व कैंसर के कारण दुनिया छोड़ गये. घर में एक मात्र पुरुष सदस्य आठ वर्षीय हिमांशु है, जिसे एक भी पैर नहीं है. माला को दो बेटियां हैं प्रीति कुमारी और रिशु कुमारी. जमीन के नाम पर एक धूर नहीं है. परिवार का खर्च प्रीति एक स्कूल में पढ़ा कर चलाती है जहां उसे मात्र 12 सौ रुपये मिलते हैं.
विकलांग बेटे को लेकर जनप्रतिनिधि से लेकर प्रखंड तक दौड़ लगा चुकी है माला. लेकिन, आज तक इन्हें सुविधा के नाम पर कुछ न मिला. सवाल उठता है कि क्या इस गरीब परिवार को सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलना चाहिए या नहीं? विकास के दौर में गरीबी के बीच जी रही इन महिलाओं की तिल-तिल कर जिंदगी हमारी व्यवस्था पर सवाल खड़ी कर रही है.
विकलांग बेटे के साथ मां और चाची
क्या कहते हैं अधिकारी
इस तरह की जानकारी हमें नहीं है. यदि ऐसी बात है तो तत्काल पता करवा करके दोनों महिलाओं को वृद्धावस्था पेंशन तथा बच्चे को विकलांग पेंशन दी जायेगी. इन्हें राशन कार्ड मुहैया कराने के लिए अनुशंसा करूंगा.
कुमार प्रशांत, बीडीओ, बरौली

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