गेहुंओं गइल, धनवो गइल, अगिलो के उम्मीद नइखे

गेहुंओं गइल, धनवो गइल, अगिलो के उम्मीद नइखे गोपालगंज विस क्षेत्रचुनाव मुद्दा चुनावी चकल्लस में याद न रहा किसानों का दर्द फोटो नं-9गोपालगंज की धरती का पूर्वी क्षेत्र गन्नांचल के रूप में प्रसिद्ध रहा है, तो पश्चिमांचल धान-गेहूं की उर्वरा भूमि रही है. वर्ष 2015 किसानों के लिए अब तक अभिशाप साबित हुआ है. किसान […]

गेहुंओं गइल, धनवो गइल, अगिलो के उम्मीद नइखे गोपालगंज विस क्षेत्रचुनाव मुद्दा चुनावी चकल्लस में याद न रहा किसानों का दर्द फोटो नं-9गोपालगंज की धरती का पूर्वी क्षेत्र गन्नांचल के रूप में प्रसिद्ध रहा है, तो पश्चिमांचल धान-गेहूं की उर्वरा भूमि रही है. वर्ष 2015 किसानों के लिए अब तक अभिशाप साबित हुआ है. किसान दर्द से कराह रहे हैं, लेकिन चुनावी चकल्लस में किसानों का दर्द किसी को याद नहीं है. चल रहे लोकतंत्र के पर्व में किसान अपने दर्द पर आंसू बहा रहे हैं.संवाददाता, गोपालगंजगोपालगंज जिले की अपनी पहचान रही है. संस्कृति के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान में भी यह आगे रहा है. यहां की उर्वरा धरती पर किसान खेती कर अपनी संपन्नता के गाथा गाते हैं, लेकिन वर्तमान व्यवस्था और प्रकृति के रूठापन ने किसानों को बेजार कर दिया है. राजनीतिक दृष्टि से जिले में छह विधानसभा क्षेत्र हैं. वैसे तो यहां चुनाव चौथे चरण में एक नवंबर को होना है, लेकिन चुनावी चकल्लस और वोट बटोरने का शंखनाद हो चुका है. कुचायकोट विधानसभा क्षेत्र में पहुंचते हैं तो याहं बातें चल रही हैं पंडितजी लोग कहां जाये हो. बाबू साहब लोग के एहबेर का हाल बा. कुछ आगे बढ़ने पर चा-पांच आदमी बैठे हैं. चुनाव की बात पूछते ही बोलते हैं- अरे हमनी किसान हयी, हमनी के त गेहुंओ गइल, धनवो गइल आ अब अगिलो फसल के उम्मीद नइखे. हमनी के चुनाव में के पूछता. इनका इशारा किसान का वर्तमान चुनाव में मुद्दा से है. बरौली विधानसभा क्षेत्र और बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र में भी यही हाल है. 2015 की खेती- किसानी पर नजर डालें, तो वास्तव में किसान कंगाली की स्थिति में हैं. फरवरी और मार्च में हुई बारिश ने गेहूं के दाने को समाप्त कर दिया. फसल क्षति की 60 फीसदी राशि किसानों को मिलने के बजाय बैंक में पड़ी है. बारिश नहीं हुई. धान सूखे की चपेट में है. डीजल सब्सिडी बंटते-बंटते आदर्श तिजोरी में बंद है. जिले के किसानों का 35 करोड़ से अधिक मिल मालिक के यहां बकाया है. चीनी की दर कम होने पर मिल मालिक अपना कारोबार समेटने के चक्कर में हैं. हर तरफ किसान दर्द से बेजार हैं, लेकिन जिले के चुनावी गणित में इनकी समस्याओं को किसी भी पार्टी ने मुद्दा नहीं बनाया है. अगर कोई रणनीति है, तो वह है जातिवाद. मुद्दा और वादों के बजाय जातीय गंठजोड़ बनाने का यहां डंका बज रहा है. क्या कहते हैं किसान विगत तीस वर्षों में सूखे की यह स्थिति नहीं थी. गेहूं की फसल को बारिश ने बरबाद कर दिया. धान की फसल सूखे से खत्म हो गयी है. चुनाव में किसानों की समस्या किसी भी पार्टी द्वारा मुद्दा नहीं बनी है. यह लोकतंत्र के लिए दुखद है.फोटो नं-11 लक्ष्मण महतो, बनकटी क्या कहते हैं विधायक प्रकृति की बेरुखी से किसान परेशान हैं. मैं इनकी समस्याओं के हल के लिए प्रयासरत हूं. डीएम को मैं पत्र लिख कर सूखे का आकलन कराने काे कहूंगा. सरकार किसी की बने, मैं किसानों के हित-लाभ के लिए प्रयासरत रहा हूं और रहूंगा. किसानों की समस्या का हल मेरा मुख्य एजेंडा है. फोटो -10 सुबास सिंह सदर विधायक, गोपालगंज

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Read More

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >