गोपालगंज : कुछ लोग गरीबी से टूट जाते हैं और कुछ गरीबी से संघर्ष करते हुए उसे मात देते हैं. अपने कर्तव्य को निभा कर ऊंचाइयों की नयी राह तलाश कर लेते हैं. कुछ ऐसे ही इरादों एवं दृढ़ निष्ठा के धनी हैं गौतम.
उन्होंने पढ़ाई के बाद अखबार बेचना शुरू किया. अखबार बेच कर न सिर्फ अपने परिवार का पालन पोषण किया, बल्कि अपने बेटों को मुकाम तक पहुंचाया. गौतम का एक बेटा जहां बैंक अधिकारी है, वहीं दूसरा बेटा वकील है.
गौतम की जिंदगी की सुबह की शुरुआत और शाम दुकान पर होती है. आज भी गौतम के अखबार बेचने का धंधा जारी है, लेकिन अपनी गरीबी की आंच उसने कभी बेटों पर न आने दिया.
मैट्रिक पास कर शुरू किया अखबार बेचना : शहर के हजियापुर निवासी गौतम साह ने 1968 में मैट्रिक की परीक्षा पास की. गरीबी के कारण आगे की पढ़ाई नहीं हो सकी नौकरी मिली नहीं. नतीजतन 1970 में गौतम ने कचहरी में अखबार बेचने का काम शुरू किया. कचहरी में अखबार के साथ साथ कागज-कलम भी बेचने लगे.
पढ़ाई का दर्द, नौकरी की अहमियत और गरीबी की मार हमेशा उन्हें याद रही और उन्होंने गरीबी को चैलेंज मानते हुए बच्चों को पढ़ा कर उन्हें मुकाम तक पहुंचाने का संकल्प लिया. उनके तीन बेटे हैं. दो वकील और बैंक अधिकारी और बीच के नीरज कुमार उनका धंधा संभालते हैं. उम्र के चौथे पड़ाव में भी गौतम अपनी दुकान उसी निष्ठा से चलाते हैं.
पिता की चाहत को बेटों ने किया पूरा
गौतम की उम्मीदों को उसके बेटों ने पूरा कर उसे खुशी दी है. एक बेटा अनूप कुमार शहर स्थित आइसीआइसीआइ बैंक में ब्रांच मैनेजर है, वहीं धीरज कुमार एलएलबी कर वकालत करता है. नीरज पिता के धंधे में हाथ बढ़ाता है.
बेटों को मुकाम देना पिता का कर्तव्य : गौतम
गौतम को अपने बेटों की उपलब्धि पर खुशी है. वे कहते हैं कि प्रत्येक पिता का कर्तव्य है कि बेटों को मुकाम देने के लिए प्रयास करे और अपने कर्म को न छोड़ें. मेरी जिंदगी की शुरुआत अखबार बेचने से हुई और इसी के साथ खत्म होगी. कचहरी स्थित यह दुकान हीं मेरे लिये मंदिर और इसे चलाना ही मेरी पूजा है.
