गया : जिले में चिकित्सक समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहे भासा व आइएमए जैसे संगठन के पदाधिकारियों का मानना है कि चिकित्सकों की सुरक्षा को लेकर जिला प्रशासन संवेदनशील नहीं है. चिकित्सकों पर हो रहे अत्याचार के मामले में पुलिस केवल कागजी खानापूर्ति कर रही है. वरीय प्रशासनिक पदाधिकारियों के साथ पत्राचार करने पर भी कोई गंभीरता नहीं दिख रही है. जिले के चिकित्सकों का मानना है कि वे भय के माहौल में काम कर रहे हैं क्योंकि उनके मन में यह बात घर कर गयी है कि उनके साथ कोई भी घटना हो जाती है, तो पुलिस-प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं मिलेगी.
डाॅक्टरों को डराने-धमकाने के प्रमुख मामले वर्ष 2016 से अब तक जिले में कई जगहों पर सरकारी व निजी चिकित्सा संस्थानों में डाॅक्टरों के साथ अभद्र व्यवहार के मामले सामने आ चुके हैं. इनमें नेत्र रोग विशेषज्ञ डाॅ अभय सिंबा से फोन पर 10 लाख रुपये मांगने व पैसे नहीं देने पर जान से मारने की धमकी देने, पिछले वर्ष बांकेबाजार में नक्सली हमले के बाद वहां के तत्कालीन थाना प्रभारी अशोक चौधरी द्वारा शराब के नशे में पीएचसी के डाॅक्टरों से गाली गलौज करने व सिविल सर्जन डाॅ बबन कुंवर को दो बार धमकी देने के मामले प्रमुख हैं. इन सभी मामलों में लिखित तौर पर शिकायत किये जाने के बावजूद अभी तक पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर सकी.
डॉक्टरों को सुरक्षा देने का प्रधान सचिव ने दिया था निर्देश भासा के प्रमंडल सचिव डाॅ उमेश कुमार वर्मा ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव आरके महाजन के उस पत्र का भी हवाला दिया है कि जिसमें तमाम जिले के डीएम व एसएसपी को स्पष्ट निर्देश है कि डाॅक्टरों की सुरक्षा के प्रति प्रशासन गंभीर रहे. 20 मई 2016 को प्रधान सचिव ने एक लिखित निर्देश जारी किया था. इसमें उन्होंने कहा था कि चिकित्सकों को सुरक्षा देना राज्य सरकार की प्राथमिकता में है. इसके लिए बिहार चिकित्सा सेवा संस्थान व व्यक्ति सुरक्षा अधिनियम 2011 पहले से गठित है. इसके अनुसार चिकित्सक के साथ मारपीट व संस्थान में तोड़-फोड़ करनेवालों के खिलाफ अधिकतम तीन साल का कारावास और 50 हजार रुपये का जुमार्ना तय किया गया है. इस श्रेणी में सभी अपराध गैर जमानतीय होंगे. प्रधान सचिव ने इस नियम को गंभीरता से पालन कराने का आदेश दिया था.
