गया
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ज्ञान व मोक्ष की धरती गया वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी कई गतिविधियों का केंद्र है, बावजूद इसके यहां सुविधाओं की कमी व संपन्नता का घोर अभाव है. शहर की सबसे बड़ी व ज्वलंत समस्या पानी की है. दूर-दराज के गांवों में लोग-बाग पानी की तलाश में पलायन कर रहे हैं. शहरी इलाकों में वाटर सप्लाइ की स्थिति ठीक नहीं है.
इसके अलावा जिले के कई गांवाें के ग्राउंड वाटर में विषाक्त रसायनों की मात्रा है. इन गांवों में पानी पीकर लोग विकृत हो गये हैं. अब तो स्थिति ऐसी हो गयी है कि इन गांवों में नवजात भी विकृत ही पैदा हो रहे हैं. दूसरी विकट समस्या है जाम की. शहर में कब और कहां जाम लग जाये पता नहीं. तीसरी समस्या बिजली-व्यवस्था की है. हालांकि, बिजली ठीक ठाक लगती है, पर लोकल फॉल्ट, जर्जर तार व बिल आदि की समस्या परेशान कर रही है. चौथी समस्या है शहर के विभिन्न इलाकों में अतिक्रमण की. फल्गु नदी से लेकर सड़कों तक अतिक्रमणकारियों की मौज है. इनके अलावा एक समस्या सर्वजन के लिए बनायी गयी इमारतों की उपेक्षा की है. जरूरत व बदलाव के हिसाब से इन इमारतों का निर्माण तो हो गया, पर देखभाल व संरक्षण के कारण ये इमारतें जर्जर व बदहाल हो गयीं. इन सबके अलावा फल्गु की दुर्दशा सड़कें पुल-पुलिया, बालश्रम व चोरी-छनतई की समस्याएं हैं, जो अंतरराष्ट्रीय ख्यात शहर की साख पर बट्टा लगा रही हैं. 10 जून, शुक्रवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गया आ रहे हैं. गया के लोगों को उनके दौरे से काफी उम्मीदें हैं. वे इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने स्थानीय स्तर पर जो वादे किये थे, उन पर जरूर चर्चा करेंगे. उनके लिए जरूर कुछ घोषणा करेंगे.
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एक तो पानी नहीं, जहां है, वहां पीने लायक नहीं
शुक्रवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गया आ रहे हैं. जिले में इन दिनों पानी के लिए मारामारी मची है. गांव-देहात से लेकर शहर तक स्थिति एक जैसी है. अधिकतर गांवों में जलस्तर तो पातालगामी हो ही गया है, अगर कहीं पानी है, भी तो वह पीने लायक नहीं है. नगर निगम की रिपोर्ट मानें, तो जिले के 360 गांवों का पानी पीने लायक नहीं है और यह स्थिति गरमी के सिर्फ एक सीजन में डेवलप नहीं हुई है. यह समस्या सालोंसाल से है. पीएचइडी की लै ब रिपोर्ट कहती है कि इन गांवों के अंडरग्राउंड वाटर में नाइट्रेट, आयरन, फ्लोराइड व अन्य विषाक्त रसायन घुले हैं. डॉक्टरी रिपोर्ट कहती है कि यहां का पानी पीने से लोगों में ऑर्थराइटिस, फ्लोराइसिस व हड्डियों से जुड़ी अन्य बीमारी हो रही है. गांवों से निकल कर जब शहर की ओर बढ़ते हैं, तो चापाकल व बोरिंग भी दम तोड़ते नजर आते हैं. इन दोनों के अलावा वाटर सप्लाइ में भी घोर लापरवाही दिखती है. कहीं, वाटर सप्लाइ टंकी की छत टूटी है, तो कहीं पाइप में लीकेज है. इससे कहीं दूषित पानी पहुंच रहा है, तो कहीं हर रोज हजारों लीटर पानी यों ही बरबाद हो जा रहा है. इन सबके बावजूद जलसंकट से कैसे उबरा जाये, इस पर स्थानीय निकायों व जिला प्रशासन की तरफ से अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गयी. अब तो लोगों को नीतीश कुमार के गया दौरे से ही उम्मीद है कि उनके आगमन से लोगों को राहत मिल जाये.
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मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों इलाज किया
आज की तारीख में जाम गया शहर का पर्याय बन गया है. शहर में लोग कब और कहां जाम में फंस जायेंगे, पता नहीं. कामकाज को लेकर बाहर से आये लोग शहर में घुसने के साथ ही सशंकित नजर आते हैं. शहर के किसी भी रोड में चले जायें, जाम से पाला पड़ जायेगा. कभी-कभी यह इतना भयावह व जटिल हो जाता है कि इसके चक्रव्यूह में घंटों फंसना पड़ जाता है. इसका सबसे बड़ा कारण यहां का ट्रैफिक सिस्टम है. ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने के लिए तैनात अधिकतर जवान अनट्रेंड है. कई तो होमगार्ड के हैं, जिन्हें ट्रैफिक व्यवस्था संभालने की बेसिक जानकारी भी नहीं है. इनके अलावा सड़कें भी कई जगह संकरी हैं, वहां की बसावट काफी घनी है, ऐसे में जाम लगना लाजिमी है. जाम से मुक्ति के लिए जिला प्रशासन की तरफ से कई बार अभियान चलाया गया, पर हर बार वह नाकाफी साबित हुआ. मतलब साफ है, ज्यों-ज्यों इलाज किया गया, मर्ज बढ़ता ही गया.
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खंडहर में तब्दील हो रहीं सार्वजनिक इमारतें
शहर में सर्वजन के लिए बनीं अधिकतर इमारतें उपेक्षित होने के कारण जर्जर व खंडहर में तब्दील हो रही हैं. जवाहर टाउन हाॅल, इंदिरा गांधी इंडोर आॅडिटोरियम व मगध सांस्कृतिक केंद्र ये सब यों ही बेकार व उपेक्षित पड़े हैं. करोड़ों रुपये की लागत से बनीं इमारतें जिस उद्देश्य से बनी थीं, उससे अलग यहां सभी प्रकार के कामकाज होते हैं. मसलन, जवाहर टाउन हॉल कभी गोदाम बन जाता है, तो कभी केदारनाथ मार्केट में सब्जी बेचनेवालों का अड्डा. संग्रहालय परिसर में बने मगध सांस्कृतिक केंद्र का इस्तेमाल पुलिस को ठहराने के लिए किया जाता है. कुछ ऐसा ही हाल इंदिरा गांधी इंडोर ऑडिटोरियम का भी है. इनका न कभी रंग-रोगन होता है, न ही कभी मेंटेनेंस. इनका कैसे इस्तेमाल हो, इस पर भी कोई प्लान नहीं बनता. जीर्णोद्धार की तो कोई बात ही नहीं करता. मुख्यमंत्री के आगमन से शहरवासियों को उम्मीद है कि वह इन समस्याओं से रू-ब-रू होंगे और करोड़ों रुपये की लागत से बनी इन इमारतों के पूरी तरह खंडहर होने से पहले कोई सकारात्मक निर्णय लेंगे.
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जर्जर तार व बूढ़े ट्रांसफॉर्मरों पर बिजली का बोझ
शहर में बिजली व्यवस्था दुरुस्त करने की जिम्मेवारी एक फ्रेंजाइजी कंपनी के पास है. कंपनी के गया में काम करते हुए दो साल हो गये. पर, इतने दिनों में अधिकतर समस्याएं पुरानी ही हैं. रोजाना टूट रहे तार, ब्रेक डाउन, लोड शेडिंग व ओवरलोड आदि के चलते बिजली आपूर्ति में बाधा आ रही है. शहर के कई इलाकों में अब भी चोरी-छिपे बिजली का इस्तेमाल किया जा रहा है. टोंका फंसा कर बिजली इस्तेमाल की आदत नहीं गयी है. जर्जर व बूढ़े हो चुके ट्रांसफॉर्मरों की समस्या यथावत है. इन सबका असर बिजली सप्लाइ पर पड़ रहा है.
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80 फुट चौड़ी सड़क बन कर रह गयी 40 फुट की
अतिक्रमण गया शहर की पुरानी समस्याओं में से एक है. शहर की मुख्य सड़कों से लेकर गली-मुहल्लों तक अतिक्रमणकारियों की मौज है. अब तो अतिक्रमण का दायरा इस कदर बढ़ गया है कि लोगों ने फल्गु नदी तक को नहीं छोड़ा. यों कहें कि फल्गु नदी में भी घर बना लिया. शहर की सड़कों पर अतिक्रमण का हाल ऐसा है कि चौड़ी सड़कें गली की सड़कें नजर आती हैं. 80 फुट चौड़ी सड़क 40 फुट की रह गयी है. अब उसे 20 फुट करने की तैयारी चल रही है. कई जगह अतिक्रमणकारियों ने अतिक्रमण कर स्थायी निर्माण कर लिया है, जिनसे पार पाना आसान नहीं रह गया है. विगत दिनों फल्गु नदी क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने के दौरान हंगामा व पुलिस-प्रशासन के अफसरों पर हुए हमलों को देख चुके हैं. अतिक्रमण का मामला कोर्ट तक पहुंच गया, पर हालात ज्यों के त्यों नजर आते हैं.
शहर की विधि-व्यवस्था पर ध्यान देने की जरूरत
गया में विधि-व्यवस्था चरमरा गयी है. शहर में अपराध की दर बढ़ी है. लोग भय व खौफ के माहौल में जी रहे हैं. व्यवसायियों को कारोबार से लेकर घर-परिवार तक की चिंता है. ऐसे में यहां कैसे कोई रोजगार-धंधा करेगा. मुख्यमंत्री महोदय को सबसे पहले इस पर ध्यान देना होगा. अगर, गया दौरे पर उनसे मिलने का मौका मिला, तो उन्हें शहर की विधि-व्यवस्था व माहौल से अवगत कराया जायेगा. उन्हें इस बात से भी रू-ब-रू कराया जायेगा कि शहर के माहौल का असर न सिर्फ यहां के लोगों पर पड़ रहा है, बल्कि यहां आनेवाले पर्यटकों व कारोबारियों पर भी पड़ने लगा है. अंतत: सरकार पर भी इसका असर दिखेगा. इनके अलावा बिजली, पानी, अतिक्रमण, जाम व स्वास्थ्य सुविधाएं हैं, जिन पर ध्यान देना बहुत ही जरूरी है. आज देखिए, गांव से लेकर शहर तक पीने के पानी के लिए त्राहिमाम है, लोग-बाग पानी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं. बिजली की समस्या है, शहर के किसी भी रोड में चले जायें, अतिक्रमण की वजह से जाम में फंसना तय है. शहर के हर वर्ग के लोगों की यही मांग है, कि मुख्यमंत्री इन समस्याओं को जाने-समझें और इनके समाधान के लिए पहल करें.
हरिप्रकाश केजरीवाल, अध्यक्ष, चैंबर ऑफ कॉमर्स
