सकारात्मक सोच से बच्चों को करें अभिप्रेरित

सफलता का एक ही मार्ग है संघर्ष का मार्ग गया : प्रभात खबर द्वारा आयोजित बचपन बचाओ अभियान के तहत शुक्रवार को मानव भारती नेशनल स्कूल में छात्र-छात्राओं के बीच परिचर्चा का आयोजन किया गया. बच्चों से बातचीत के क्रम में जो बातें उभर कर सामने आ रही हैं, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है […]

सफलता का एक ही मार्ग है संघर्ष का मार्ग

गया : प्रभात खबर द्वारा आयोजित बचपन बचाओ अभियान के तहत शुक्रवार को मानव भारती नेशनल स्कूल में छात्र-छात्राओं के बीच परिचर्चा का आयोजन किया गया.

बच्चों से बातचीत के क्रम में जो बातें उभर कर सामने आ रही हैं, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सामाजिक परिवेश बच्चों के विकास में सकारात्मक भूमिका निभाने में कहीं न कहीं चूक कर रहा है. नन्हें बच्चे जब यह कहते हैं कि पढ़ाई-लिखाई या अन्य बातों को लेकर समाज के द्वारा यह दबाव बनाया जाता है कि सफलता की प्राप्ति में विलंब होने की स्थिति में ताने दिये जाते हैं. ऐसी स्थिति में नकारात्मकता विद्यार्थियों में घर कर जाती है.

और ऐसे में समाज का कोई सदस्य या शिक्षक उन्हें लक्ष्य प्राप्ति के लिए अभिप्रेरित नहीं कर पाता है. इस मौके पर गया कॉलेज के शिक्षा विभाग के अध्यक्ष डॉ धनंजय धीरज व प्रभात खबर के वरीय संवाददाता रोशन कुमार ने बच्चों को उनके बचपन से संबंधित बातों पर टिप्स दिये. डॉ धनंजय धीरज ने कहा कि प्यारे बच्चों, सफलता किसी रंग-रूप जाति धर्म की मोहताज नहीं होती. सफलता का एक ही मार्ग है और वह है संघर्ष का मार्ग. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोई भी व्यक्ति आपसे इस तरह की नकारात्मक बात करता है.

आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि ट्रेन हादसे में अरुणिमा सिन्हा के दोनों पैर कट चुके थे. लेकिन, अपने दृढ़ संकल्प, निश्चय और निरंतर अभ्यास के माध्यम से कृत्रिम पैरों की सहायता से उन्होंने माउंट एवरेस्ट की सातों चोटियां लांघ दीं. समाज में और भी ऐसे कई उदाहरण हैं, जिन्होंने संघर्ष करके अपने जीवन को नयी पहचान दी है.

अकु राजा : हमारे लक्ष्य में सकारात्मक सोच का कितना रोल है ?

लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सकारात्मक सोच का होना और नकारात्मक सोच का नहीं होना, दोनों जरूरी हैं. जीवन में पल-पल समाज से मिल रहे तानों से और विपरीत परिस्थितियों से आपके अंदर नकारात्मकता की भावना प्रवेश करने लगती है.

आवश्यकता है कि सकारात्मक सोच के माध्यम से हर उस परिस्थिति को चुनौती में बदल देना, और संघर्ष के माध्यम से सकारात्मक सोच के माध्यम से उस चुनौती को जीत लेना. इसमें बच्चों के लिए एक सुझाव यह भी है कि सदैव ऐसे लोगों से मिले जुलें और उनके साथ समय बितायें जो सकारात्मक और अभिप्रेरणात्मक बातें करते हों. वैसे लोगों की संगत छोड़ दें, जो सदैव नकारात्मक बातें करते हों. किसी भी अच्छे कार्य को प्रोत्साहित नहीं करते हों.

प्रीति : अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद देश में सेवा दूं या विदेश में ?

आपके समक्ष बड़ी चुनौती लक्ष्य की प्राप्ति है. इसके उपरांत आप स्वतंत्र हैं कि अपनी सेवाएं देश में दे या विदेश में. परंतु, इतना निवेदन अवश्य है आप जब भी मातृभूमि पर लौटें, देश के लिए समाज के लिए कुछ लेकर लौटें और कुछ दिन अपने देश की सेवा अवश्य करें.

देश आज इस समस्या से भी जूझ रहा है कि यहां के ज्यादातर अच्छे प्रोफेशनल्स कारण चाहे जो भी हो, विदेशों में ही अपनी सेवाएं देना चाहते हैं. इसे ब्रेन ड्रेन कहा जाता है. राष्ट्र हित में यह आवश्यक है कि अापको अपनी सेवाएं कुछ समय के लिए ही सही, समर्पण के भाव से राष्ट्र को समर्पित करना चाहिए.

ऋषिकेश : प्रोफेशनल खिलाड़ी बनना चाहते हैं, पर मम्मी-पापा का दबाव है कि डॉक्टर बने, इससे कैसे उबरें ?

पूर्व निर्धारित जीवन लक्ष्य यदि किसी कारणवश प्राप्त नहीं हो या किसी परिस्थितिवश अपने पूर्व निर्धारित लक्ष्य में परिवर्तन करना पड़े, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. परंतु, आप जो भी लक्ष्य निर्धारित करते हैं, उसमें सर्वश्रेष्ठ बने रहने की चुनौती आप के समक्ष सदा बनी रहती है.

ऐसी परिस्थितियों से विद्यार्थी विचलित नहीं हों और संघर्ष से जीवन की हर ऊंचाई को पाने की कोशिश करें. जीवन में प्राप्त ज्ञान विभिन्न क्षेत्रों में काम आ सकता है.

कुशाग्र : पढ़ाई पर हमारी एकाग्रता क्यों नहीं बन पाती है ?

एकाग्रता किसी भी एक विषय वस्तु पर नहीं होने के अनेक कारण हो सकते हैं.

पढ़ाई लिखाई में आपकी एकाग्रता नहीं होने का कारण एक यह भी हो सकता है कि यह पहली प्राथमिकता में नहीं हो. दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि एक विषयवस्तु या एक उद्देश्य के समानांतर अाप दूसरी गतिविधि भी बनाये रखते हैं. ऐसे में यह आवश्यक है कि किसी एक समय में एक उद्देश्य को लेकर चलें. एकाग्रता को बढ़ाने के लिए विद्यार्थी मेडिटेशन या योगा का भी सहारा ले सकते हैं.

आशीष : जब भी पढ़ाई करने को लेकर किताब उठाते हैं, नींद क्यों आने लगती है ?

किसी भी विषय में रुचि नहीं होने के कारण ऐसा संभव है. खास तौर से किसी विषय, जिसमें आपकी रुचि नहीं हो, या अपने आप को कमजोर महसूस करते हों, वैसी स्थिति में उस पाठ्य पुस्तक को पढ़ने की इच्छा नहीं होती है. प्रत्येक विद्यार्थी के साथ किसी एक विषय को लेकर या किसी एक शिक्षक की घंटी को लेकर ऐसी स्थिति संभव है. इसके निराकरण के लिए उस विषय का अभ्यास करना चाहिए.

अंशिका : क्या एकाग्रता सिर्फ स्टडी में ही जरूरी है ?

एकाग्रता न सिर्फ पढ़ाई-लिखाई में बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में जरूरी है. पढ़ाई-लिखाई से लेकर भोजन करने, सजने संवरने, घर से विद्यालय आने, किसी भी गृहकार्य को संपादित करने, किसी व्यक्ति विशेष से वार्तालाप करने, सब में एकाग्रता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. एकाग्रता के अभाव में जीवन के किसी भी क्षेत्र में किसी भी कार्य को संपादित करने में कठिनाई होगी.

उदाहरण स्वरूप खेल के मैदान में बॉलर व बैट्समैन, दोनों अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रता रखते हैं. यदि बॉलर से चूक होती है तो बल्लेबाज उसकी गेंद पर छक्का लगाता है. यदि बल्लेबाज की एकाग्रता भंग होती है तो वह आउट होता है और बॉलर अपने लक्ष्य को पाने में सफल होता है.

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