जलसंचय की समुचित व्यवस्था न होने से हर बार गर्मी में होती है लोगों को परेशानी
टिकारी : गर्मी अभी तो दस्तक ही दे रही है और इस शुरुआती दौर में ही तेजी से जलस्तर नीचे जा रहा है. जलस्तर के नीचे चले जाने के कारण अनुमंडल क्षेत्र के लोग इस बात से परेशान हो रहे हैं कि गर्मी जब अपने प्रचंड तेवर दिखायेगी, तब क्या होगा? टिकारी अनुमंडल क्षेत्र के सभी चार प्रखंडों में भूगर्भीय-जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है. भूगर्भीय-जलस्तर को बनाये रखने में सहायक की भूमिका निभाने वाले अधिकतर जलाशय भी सूख चुके हैं.
सूत्र बताते हैं कि क्षेत्र में वर्षा कम होने के कारण अंडरग्राउंड वाटर लेवल नीचे जाने की समस्या हुई है. इस क्षेत्र के कई जगहों पर भूगर्भीय-जलस्तर 40 फुट पर है, कई जगहों पर जमीन की ऊपरी तल से 70 फुट नीचे पानी मिल रहा है तो कहीं 250 फुट पर . मार्च के महीने में रिकार्ड पारा बढ़ने पर लोग इस बात को लेकर सशंकित हैं कि आने वाले समय में जलस्तर और नीचे जा सकता है. आने वाले समय में लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (पीएचईडी) के कर्मचारियों के सामने जलस्तर बनाये रखना प्रमुख चुनौती होगी.
क्या कहते हैं गांव के लोग
पारंपरिक जलस्रोतों को दुरुस्त कर लिया जाये तो जलस्तर की समस्या दूर हो सकती है. लोगों में जल को सरंक्षित करने को लेकर जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है.
जितेंद्र कुमार सिन्हा, पूर्व अध्यक्ष (नगर पंचायत)
गर्मी शुरू होते ही कोंच में पानी की समस्या उत्पन्न हो जाती है, जलस्तर नीचे चले जाने से मोटर पंप से पानी के लिये भी परेशानी उठानी पड़ती है.
शोभा देवी
चापाकलों की करायी
जा रही मरम्मत
पीएचईडी विभाग के एसडीओ राजेश कुमार ने फोन पर बताया कि जहां से शिकायत प्राप्त हुई है, वहां चापाकल में पाइप जोड़ कर उसे चालू किया गया है. परैया में चापाकल के रिपयरिंग का काम हुआ है. कहीं-कहीं विद्यालयों में नये चापाकल लगाये जा रहे हैं. 10 दिनों के अंदर नये चापाकल लगाने का काम पूरा कर लिया जायेगा. विभाग की मोबाइल टीम 10 अप्रैल से अनुमण्डल क्षेत्र में खराब चापाकलों की मरम्मत का कार्य करेगी.
क्या कहते हैं एसडीओ
टिकारी एसडीओ मनोज कुमार ने बताया कि पानी की समस्या से निजात दिलाये जाने को लेकर पीएचईडी विभाग को आवश्यक कार्रवाई के लिये निर्देश दिया गया है.
जलस्तर के नीचे चले जाने के कारण खेतों में लगी फसल पानी के बिना सूख रही है. यदि नहर में पानी होता तो पटवन में परेशानी नहीं होती. कारण इसकी मार फसल पर पड़ती है.
डॉ विनोद कुमार सिंह
