‘राधा झूले झूला, संग में श्याम सवारिया’, कजरी की तान पर झूम उठा अहल्यास्थान

सावन के पावन अवसर पर अहल्यास्थान में राधा-कृष्ण के झूलनोत्सव का आयोजन किया गया. कजरी और भजनों की धुन पर झूम उठे श्रद्धालु.

दरभंगा झूलनोत्सव: सावन की रिमझिम फुहारों के बीच जब मंदिर की दीवारों पर लिखे शब्द “गौतम नारी शाप वश उपल देह धरि धीर...” के सामने हारमोनियम की मधुर धुन बजी, तो पूरा अहल्यास्थान भक्तिरस में डूब गया. “झूला झूलें राधा प्यारी, झुलावें नंदकिशोर...” की स्वर लहरियों के साथ श्रद्धालु भी भक्ति में झूम उठे.

पांच दिनों से चल रहा पवित्र झूलनोत्सव शुक्रवार को भक्तिमय माहौल में संपन्न हुआ. अहल्यास्थान और गौतम आश्रम समेत कमतौल क्षेत्र के प्रमुख मठ-मंदिरों में भगवान को फूलों से सजे झूलों पर विराजमान कर झुलाया गया. देर रात तक भजन, कीर्तन, कजरी और मल्हार की गूंज सुनाई देती रही.

फूलों से सजे झूले पर विराजे राधा-कृष्ण

अहल्यास्थान, गौतम आश्रम, राम जानकी मंदिर, हनुमान मंदिर और शिवालयों में झूलनोत्सव को लेकर विशेष सजावट की गई थी. मंदिरों में राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को रंग-बिरंगे फूलों से सजे झूले पर विराजमान किया गया.

नीली दीवारों वाले छोटे से मंदिर में सीता-राम और हनुमानजी के चित्रों के बीच महंत बजरंगी शरण के नेतृत्व में गायक मंडली ने देर रात तक भक्ति गीतों की प्रस्तुति दी. एक ओर हारमोनियम की मधुर धुन थी, तो दूसरी ओर झाल और ढोलक की थाप पर श्रद्धालु झूमते नजर आए.

कजरी के बोल सुनकर भावुक हुए श्रद्धालु

अहल्यास्थान के सिया पिया निवास में झूलनोत्सव में शामिल कलाकार | Prabhat Khabar Network

झूलनोत्सव के दौरान जब गायक मंडली ने कजरी और सावन के पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति शुरू की, तो माहौल और भी भक्तिमय हो गया. “कजरा लगाओ री सखी, सावन में बरसे बदरिया...” जैसे गीतों ने श्रद्धालुओं को भावुक कर दिया.

इसके बाद “राधा झूले झूला, संग में श्याम सवारिया” की प्रस्तुति पर मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालु भक्ति में डूब गए. सावन की फुहारों और भजनों की स्वर लहरियों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया.

जीव और परमात्मा के प्रेम का प्रतीक है झूलनोत्सव

महंत ने बताया कि झूलनोत्सव केवल भगवान को झूला झुलाने का आयोजन नहीं है, बल्कि यह जीव और परमात्मा के प्रेम और समर्पण का प्रतीक भी है. सावन के महीने में जब पूरी प्रकृति हरियाली और फुहारों के बीच झूमती है, तब भक्त भी भगवान को झूला झुलाकर अपने प्रेम और भक्ति का इजहार करते हैं.

उन्होंने बताया कि श्रावण शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पांच दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में प्रतिदिन शाम को झूला, कजरी, मल्हार और भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया.

विशेष भोग के बाद श्रद्धालुओं में बांटा गया प्रसाद

झूलनोत्सव के अंतिम दिन भगवान को विशेष भोग अर्पित किया गया. इसके बाद मंदिर पहुंचे श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया. पांच दिनों तक चले इस धार्मिक आयोजन के समापन के साथ ही अहल्यास्थान और कमतौल क्षेत्र का माहौल पूरी तरह भक्ति और आस्था में सराबोर नजर आया.

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By Shivendra kumar shar

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