रमजान : रोजेदारों की दुआ को क़ुबूल करता अल्लाह, परहेजगारी के साथ रोजा रखनेवाले खुशनसीब
दरभंगा/अलीनगर : खुशनसीब हैं वे लोग जिसने अपनी जिंदगी में रमजान का महीना पाया. परहेजगारी के साथ रोजे रखें. मदरसा अजहरुल ओलूम पैगंबरपुर केवटी के प्रभारी सदर मुदर्रिस मौलाना फरीद अहमद सिद्दीकी ने कहा कि रमजान के महीना की बड़ी फजीलत है. इस महीना की इबादतों और नेकियों का सवाब अल्लाह कई गुणा बढ़ा कर देता है.
महीने भर के रोजे की आदत को अगर लोग बाद में बिगाड़ें नहीं तो किसी मुसलमान से कोई ऐसी गलती नहीं हो सकती, जिससे पूरे शर्मसार होना पड़े. रोजा से सब्र और बर्दाश्त करने के साथ नेकी और भलाई करते रहने की आदत पड़ जाती है. जिसने पाबन्दी के साथ रोजे रखा और उसकी पूरे तौर पर हिफाजत की, तो यह यकीनी है कि उससे अपराध, दुराचार एवं घृणा की कोई हरकत हो ही नहीं सकती. उन्होंने कहा कि इस्लाम अमन और भाईचारा का मजहब है. यही तालीम हजरत मोहम्मद(स.) ने सिर्फ अपनी उम्मत को नहीं बल्कि पूरी इंसानियत को दी है. इस्लाम में पांच वक्त की नमाज पढ़ना अनिवार्य है.
यह तमाम बुराईयों से रोकने का रिमोट है. रमजान का महीना मुसलमानों को इंसानियत की और ले जाने के लिये, अपनी गड़बड़ी सुधारने के लिये कार्यशाला के रूप में है. इसे इस्लामी और इंसानी प्रशिक्षण का महीना भी कहा जाता है. इस महीना में जिसने अपनी जिंदगी की शैली में सुधार नहीं की, निश्चित तौर पर वह बदनसीब लोग हैं. रोजेदारों पर अल्लाह के बड़े बड़े इनआम हैं. मुसलमानों को चाहिये कि रमजान का सम्मान करे, खूब नेकी व इबादत करें और अल्लाह से अपनी मगफिरत, मुल्क की खुशहाली व अमन, शान्ति की दुआ करें. अल्लाह रोजेदारों की दुआ को क़ुबूल करता है.
अपने घरों में बनाये दीनी व मजहबी माहौल : कासमी
अलीनगर : अपने घरों में दीनी व मजहबी माहौल बनायें. अपने बच्चों को स्कूली तालीम के साथ दीनी तालीम भी जरूर दें. उक्त बातें रूपसपुर में छह दिवसीय तरावीह की नमाज के समापन के अवसर पर मुफ्ती हाफिज व कारी मो. इसहाक कासमी ने नमाजियों को ख़िताब करते हुए कही. कहा कि समाज में तरह- तरह की खराबियां आ रही है. इससे बचने के लिये घर-घर में दीनी माहौल बनाने के लिये जागरूकता जरूरी है. रमजान में मुकम्मल एक कुरआन का पढ़ना नेकी व सआदत की बात है. तरावीह का पढ़ना सुन्नत है. तरावीह के माध्यम से आप सभी ने एक कुरआन सुन लिया, तो सुन्नत के अदा होने के साथ आपको यह सआदतमंदी हासिल हुई. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इस महीना में आगे आपको अब तरावीह नहीं पढ़नी है. बल्कि नियमित रूप से तरावीह का पढ़ना जरूरी है.
शेष दिनों में सुविधा के हिसाब से नजदीक की मसजिदों में तरावीह की नमाज पढ़ें और अपनी मगफिरत की दुआ करें. अपने को अति व्यस्त समझने वाले लोग रमजान में हाफिजे कुरआन को रख कर कम से कम दिनों में एक कुरआन मुकम्मल खत्म करा कर तरावीह पढ़ने की औपचारिकता पूरी कर रहे हैं. ऐसा इसलिए कि वे बाद के दिनों में तरावीह नहीं भी पढ़ सके तो एक कुरआन सुनने वालों की श्रेणी में वह भी माना जाए.
मुफ्ती इसहाक के अनुसार यह उचित नहीं है. तरावीह पूरे महीने पढ़नी ही चाहिये. हां कुछ लोग शेष दिनों में सूरह तरावीह अपने घरों अथवा प्रतिष्ठानों पर जरूर पढ़ते हैं, जो दुरुस्त और सही माना जाता है. तरावीह का आयोजन चांद रात से हुआ था जो एक जून की रात संपन्न हुआ. इस मौके पर मौलाना फिरोज आलम, मास्टर महताब आलम, आबिद हुसैन, सरपंच लाल मोहम्मद, पूर्व सरपंच कमरुद्दीन आजाद, कारी एकरामुल हक एवं मो. सिताब सहित बड़ी संख्या में लोग शरीक थे.
