गंदगी के ढेर पर प्यास से छटपटा रहा जिला परिषद, देखरेख के अभाव में बेकार पड़े हैं अधिकांश चापाकल
दशकों पुराने कुंआ को बना दिया कूड़ादान
दरभंगा : कहते हैं दूसरे को गुड़ छोड़ने के लिए कहने से पहले खुद गुड़ छोड़ना पड़ता है. यह प्रसिद्ध वाक्य लगता है जिला परिषद भूल गया है. उसे याद दिलाने की जरूरत है. कारण दूसरों को जल संरक्षण का संदेश देनेवाला जिप खुद इस दिशा में लापरवाह है.
उसके अपने परिसर में पेयजल संकट है. रखरखाव के अभाव में जहां चापाकल से पानी नहीं निकल रहा, वहीं परंपरागत जल भंडार के रूप में बने कुंआ कचरों से पटा पड़ा है. हैरत की बात यह है कि अवसर विशेष पर इस मुद्दे पर बड़ी-बड़ी बात करनेवाले पदाधिकारी व जनप्रतिनिधि तक की नजर इस ओर नहीं है.
यहां भी चाहिए जलदूत : भीषण गरमी में चापाकल ने जवाब देना शुरु कर दिया है. हालांकि इस बीच में रह-रह कर हो रही वर्षा से परेशानी अपेक्षाकृत कम है, लेकिन आलम यह है कि दो से तीन लगातार तेज धूप निकलते ही चापाकल हांफने लगते हैं. वैसे तो यह समस्या पूरे जिला में है, लेकिन शहर में इसने विकराल रूप धारण कर रखा है. जल संकट केवल इसी शहर या जिला में नहीं है, बल्कि जलस्तर नीचे चले जाने की वजह से सभी जगह कमोबेश एक सी परेशानी लोगों को झेलनी पड़ रही है.
इसीलिए सरकार की ओर से इसके लिए जनजागृति की कोशिश चल रही है. इस कड़ी में गांव-गांव में जलदूत के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है, लेकिन जल संरक्षण का पाठ पढ़ाने वाले जिला परिषद का हाल खुद खास्ता है. लोगों का मानना है कि जलदूतों को अपने अभियान की शुरूआत जिला परिषद से ही करनी चाहिए थी.
देखरेख के अभाव में चापाकल बेकार : जिला परिषद कार्यालय परिसर में पेय जल की प्रर्याप्त व्यव्था नहीं है. जो है वह पर्याप्त नहीं है. सही देखरेख नहीं होने के कारण इसमें कुछ ऐसे भी चापाकल हैं, जो मामूली खराबी के कारण बेकार पड़े हैं. उससे पानी नहीं निकाल रहा. वहीं कुछ ऐसे भी चापाकल हैं जहां गंदा पानी जमा रहता है. लिहाजा उससे संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है. इधर, इस परिसर में कुछ ऐसे भी चापाकल हैं, जिसका हेड खोलकर पता नहीं किसने गायब कर दिया.
मिट रहा कुआं का वजूद : पोखर, डबरा उड़ाही का संदेश देने वाले के खुद के परिसर के अंदर में जमाने का एक कुआं है. इसे कर्मियों ने कूड़ादान बनाकर रख दिया है. एक जमाने में अपनी गहरायी व मीठे जल के लिए मशहूर यह कुआं आकंठ कचरों से भर गया है. इतना ही नहीं इसके चबूतरे पर गोबर की चिपड़ी तक ठोकी जाती है. धूप में इस चिपरी को सुखाने का यह चबूतरा सबसे अच्छा स्थान बन गया है, जबकि जानकार कहते हैं कि पूरी दुनिया जल संकट को कम करने के लिए पानी के संग्रह की दिशा में आगे बढ़ रही है. इसमें कुआं सरीखे जल ग्रहण माध्यम को सबसे बेहतर माना गया है.
बाहर से पानी ढोते कार्यालय कर्मी : जिला परिषद में जल संकट का आलम यह है कि वर्तमान में चतुर्थवर्गीय कर्मी को पानी परिसर के बाहर दूर से लाना पड़ता है. पानी ढो-ढो कर परेशान हो रहे हैं. यही नहीं जिला परिषद के भाड़े के भवन में शिक्षा विभाग व डीटीओ कार्यालय चलता है. किसी कार्यालय में चापाकल की समुचित व्यवस्था नहीं है. इसके अलावा जिला परिषद परिसर में अपने कार्यालय के अलावा आईसीडीएस कार्यालय व आरईओ कार्यालय भी है. पूरे परिसर के कार्यालयों के कर्मी इन्ही दो चापाकल पर निर्भर हैं. वह भी इन दिनों बेकार पड़ा है. पदाधिकारी व जनप्रतिनिधि तो बोतल बंद पानी से काम चला लेते हैं, पर अपनी फरियाद लेकर इस परिसर के किसी कार्यालय में आनेवाले पानी के लिए भटकते रहते हैं. पेयजल समस्या तो यहां है ही, परिसर के अंदर के शौचालय का भी बुरा हाल है. शौचालय गंदगी से भरा पड़ा है. पेयजल व स्वच्छता का पैगाम देनेवाले आज खुद गंदगी की ढेर पर प्यासे जीने को मजबूर हैं.
भीषण गरमी को देखते हुए पानी की किल्लत को दूर करने के लिए समरसेबल गरवाया गया है. परिषद के अंदर के चापाकल जो मामूली खराबी के कारण बेकार पड़े हैं, उसे शीघ्र ठीक करवाया जाएगा.
गीता देवी, अध्यक्ष जिला परिषद
