12 साल में लागत में 11 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी, फिर भी योजना नहीं हुई पूरी
दरभंगा : मर्ज बढ़ती गयी ज्यों-ज्यों दवा की, यह कहावत नगर जलापूर्ति योजना पर पूरी तरह सटीक बैठती है. एक दशक से अधिक का वक्त गुजरने के बाद भी शहरवासियों को इस योजना का आज तक लाभ नहीं मिल सका है. गरमी के दिनों में पेयजल संकट से जूझनेवाले लोगों की समस्या तो जस की तस ही रही, लेकिन इस योजना की लागत जरूर बढ़ गयी.
आमजन के पैसे की खपत में इजाफा हो गया. 22 करोड़ की निर्धारित लागत बढ़कर 33 करोड़ पहुंच गयी, बावजूद नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहा. एक भी जलमीनार लोगों की प्यास बुझाने में पूरी तरह सफल नहीं हो सका. उल्लेखनीय है कि वित्तीय वर्ष 2016-17 में भी जलापूर्ति योजना पूरी नहीं हो सकी. योजना को लेकर पीएचईडी की ओर से बरती गयी उदासीनता व सुस्ती के कारण इस बार भी गरमी में लोगों का हलक सूखा ही रह जायेगा.
12 साल में 60 फीसदी काम ही पूरा : वर्ष 2006 में जलापूर्ति योजना स्वीकृत हुआ. इसके तहत शहर के विभिन्न हिस्से में नौ जलमीनार बनाये जाने थे. पाइप लाइन बिछाने के साथ ही स्टैंड पोस्ट भी लगाया जाना था, लेकिन 12 वर्ष बीत जाने के बाद भी पाइप लाइन, स्टैंड पोस्ट आदि के महज 60 प्रतिशत ही काम पूरा हो सका है. इतना ही नहीं इस योजना को लेकर पीएचईडी द्वारा शिथिलता बरतने के कारण समय के साथ-साथ लागत से अधिक राशि भी निगम को चुकानी पड़ी.
अधूरे काम के बाद ही हैंडओवर कराने की कोशिश : इस योजना को लेकर पीएचईडी द्वारा शिथिलता बरतने की वजह से निगम की बैठकों में सदस्यों द्वारा विरोध भी जताया जाता रहा. कई बार शोर-शराबा भी हुआ. एक बैठक में तो निगम पार्षदों ने इसे अनियमितता मानते हुए निगरानी से जांच तक कराने की मांग की, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा. अंतर सिर्फ इतना हुआ कि तंग आ नगर विकास एवं आवास विभाग ने शेष कार्य को पूरा करने का जिम्मा जल पर्षद को सौंपा दिया.
आधी आबादी सुविधा से वंचित : फिलवक्त इस योजना से आधा भाग को भी विभाग पेयजल आपूर्ति की सुविधा नहीं दे सका है. कुछ इलाकों में काम पूरा होने का हवाला देकर पीएचईडी ने निगम को हैंड ओवर कर लेने के लिए भी कहा.
इस पर निगम ने पार्षदों की एक टीम गठित कर जमीनी सच्चाई की पड़ताल करने को कहा. इस रिपोर्ट में कई इलाकों में काम पूरा नहीं होने की बात बतायी गयी. लिहाजा निगम ने टेक ओवर नहीं किया.
निगम ने कर दिया भुगतान: विभागीय सूत्र बताते हैं कि जलापूर्ति योजना को लेकर अब तक नगर निगम करीब 33 करोड़ रुपया पीएचईडी को दे चुका है. वर्ष 2006 में योजना पर काम के लिए पीएचईडी ने किर्लोस्कर ब्रदर्स को जिम्मेबारी सौंपी थी. उस समय योजना की निर्धारित लागत करीब 22 करोड़ ही थी, लेकिन समय पर काम पूरा नहीं हो सकने के कारण यह रकम बढ़ कर 33 करोड़ तक पहुंच गयी. वैसे जिस रफ्तार से काम हो रहा है, उससे इसके और बढ़ जाने की आशंका जतायी जा रही है.
जलाआपूर्ति को लेकर पीएचईडी ने कुल नौ जलमीनार का निर्माण किया. इसमें लक्ष्मीसागर, जिला स्कूल, महात्मा गांधी कॉलेज के निकट, पीएचडी कार्यालय के पीछे, राय साहब पोखर, नगर निगम गोदाम, मिल्लत कॉलेज आदि स्थान शामिल हैं. इन सभी जगह पर मीनार तो तैयार हो गया, लेकिन कहीं भी यह मानक के अनुरूप अभी तक नहीं तैयार हो सका है. कहीं लीकेज है तो कहीं स्टैंड पोस्ट पर टोटी नहीं है. जहां पाइप बिछाये गये, उसमें अधिकांश स्थानों पर लीकेज बताया जा रहा है. यही कारण है कि जलापूर्ति नहीं की जा रही है.
उदाहरण स्वरूप लक्ष्मीसागर में जब कभी पानी का सप्लाई शुरू होता है, पूरी सड़क पानी में डूब जाती है. लोगों के घर तक में पानी प्रवेश करने लगता है.
योजना की मौजूद स्थिति : 12 वर्षों से चल रही इस योजना में पाइप बिछाने में 30 से 40 प्रतिशत काम बचा हुआ है. जिला स्कूल में बने जलमीनार की बोरिंग खराब होने के कारण उससे मटमैला पानी निकलता है. फलत: पानी उपयोग लायक नहीं रहता. वहीं कई टावर ऐसे हैं जिनसे पानी रिसने की बात बताई जा रही है.
पारा चढ़ने के साथ सहमे शहरवासी
मालूम हो कि जैसे-जैसे तापमान का पारा चढ़ने लगा है, लोगों का हलक सूखने लगा है. गरमी के दिनों में भूगर्भीय जल स्तर कम होने से पानी चापाकलों का साथ छोड़ देता है. लोगों की दिनचर्या बदल जाती है.
पानी भरने के लिए लोगों को रतजगा करना होता है. यह मौसम फिर से आ गया है, लिहाजा लोग सहमे हुए हैं. इस योजना की स्वीकृति के बाद शहरवासियों को पेयजल की समस्या से निजात मिलने का पूरा भरोसा था, लेकिन विभागीय सुस्ती की वजह से आज तक उनका भरोसा आकार नहीं ले सका है.
