सरसों में लाही कीड़े का होगा आक्रमण

सरसों में लाही कीड़े का होगा आक्रमण आसमान में हल्के बादल छाये रहने से जतायी जा रही संभावनाकरें मेटासिस्टॉक्स दवा का छिड़काव दरभंगा. आसमान में हल्के बादल छाये रहने से सरसों की फसल में लाही कीड़ों का आक्रमण हो सकता है. बचाव के लिए मेटासिस्टॉक्स दवा का 1 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर […]

सरसों में लाही कीड़े का होगा आक्रमण आसमान में हल्के बादल छाये रहने से जतायी जा रही संभावनाकरें मेटासिस्टॉक्स दवा का छिड़काव दरभंगा. आसमान में हल्के बादल छाये रहने से सरसों की फसल में लाही कीड़ों का आक्रमण हो सकता है. बचाव के लिए मेटासिस्टॉक्स दवा का 1 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें. रसायनों का प्रयोग आसमान साफ होने अथवा संभावित वर्षा की स्थिति को देखते हुऐ करें. यह सुझाव राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय के नोडल ऑफिसर डा. ए.सत्तार ने किसानों को दिया है. उन्होंने कहा है कि अरहर की फसल जिसमें 50 प्रतिशत फूल आ गया हो उसमें फली छेदक कीट का प्रकोप हो सकता है. बचाव के लिए प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी. दवा 2़ मिली प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें. पूर्वानुमानित मौसम में आलू की फसल में अगात एवं पिछात झुलसा रोग का प्रसार हो सकता है. फसल को झुलसा रोग से बचाव के लिए इण्डोफिल एम 45 या साइनोमैक्सी एवं मैनकोजेव फफॅूदी नाशक दवा के मिश्रण का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर सकते हैं. ओयस्टर मशरूम की सेजोर काजू एवं जमोर प्रभेद (गुलाबी प्रभेद )की बुआई शुरू करें. प्याज का पौध जो कि 45-50 दिनों का हो गया हो, तैयार क्यारी में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 15 सेमी, पौध से पौध की दूरी 10 सेमी पर रोपाई करें. पौध की रोपाई अधिक गहराई में नहीं करें. सरसों में सफेद रतुआ (व्हाईट रस्ट) रोग की निगरानी करें. प्रकोप दिखाई दे तो क्लोरथालोनील दवा 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर मौसम साफ रहने पर छिड़काव करें. मटर की फसल में चूर्णिल फफूंदी (पाउडरी मिल्डयू) रोग की निगरानी करें. जिसमें पत्तियोंं, फलों एवं तनों पर सफेद चूर्ण दिखाई पड़ती है. इस रोग से बचाव के लिए फसल में कैराथेन दवा का एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी अथवा सल्फेक्स दवा का 3 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें. मटर की फसल में अच्छे फलन के लिए 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव करें. बरसीम और लूसर्न की कटाई 25-30 दिनों के अन्तर पर करेंं. प्रत्येक कटनी के बाद सिंचाई करें. सिंचाई के बाद खेतों में 10 किलो ग्राम प्रति हेक्टर की दर से नेत्रजन दें. दूधारु पशुओं के रख-रखाव एवं खान पान पर विशेष ध्यान दें.

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