जकात देना इस्लाम के मूल सिद्धांतों में है
दरभंगा /अलीनगर : जकात देना इस्लाम के मूल सिद्धांतों में तीसरा है. इसके निकालने से माल पाक हो जाता है. साथ ही गरीबों की मदद हो जाती है. उक्त बातें अलीनगर चौक की मस्जिद के खतीब व इमाम मुफ्ती मो. रफीक कासमी ने कही. कहा कि रमजानुल मुबारक का महीना बड़ी शान व अजमत वाला महीना है. इस माह में अधिक से अधिक इबादत और नेकी करने में उम्मत की भलाई है.
इस महीना में जकात और फितरा की राशि निकालने का हुक्म है. जकात का अर्थ तहारत, पवित्रता, बरकत और बढ़ना होता है. इस्लामी कानून में अपने माल अर्थात चल संपत्ति का मूल्यांकन कर तथा नकद राशि का भी समेकित रुप से ढाई प्रतिशत निकाले जाने की व्यवस्था है. इसे जकात की राशि कही जाती है. हदीस की रोशनी में कहा कि अपने मालों को जकात के जरिए से पाक किया करो. सदका ए फित्र अदा कर रोजा को कुबूल करवाया करो. जिसके ऊपर जकात फर्ज है, उस पर फित्रा भी वाजिब है.
एक हदीस का हवाला देकर उन्होंने यह भी कहा कि सुखी संपन्न व्यक्ति भी सदका एक फित्र अदा करें और गरीब आदमी भी. अल्लाह संपन्न व्यक्ति के माल को पवित्र और पाकीजा बनाएगा तो गरीब आदमी को और ज्यादा माल अता करेगा. नबी ए पाक हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के जमाने में सदका ए फित्र ईद की नमाज अदा करने से पहले निकाला जाता था. इसलिए वे ईद की नमाज से पहले अदा करने का हुक्म फरमाया करते थे.
ईदगाह जाने से पहले अदा करने का तरीका रहा है, लेकिन राशि अभी से ही अदा की जाए तो बेहतर है. राशि से गरीबों के घरों में भी रमजान और ईद की रौनक बढ़ जाएगी. ईद के दिन भी खुशियां दिखाई पड़ेगी. उन्होंने युवा से अपील की कि जिंदगी में जवानी बार-बार नहीं आएगी और कोई ठिकाना नहीं की जिंदगी में रमजान भी दोबारा नसीब हो. इसलिए रमजान मुबारक का रोजा रखने में कोई बहानेबाजी नहीं करें. सभी रोजे रखें और रोजे के तकाजों को पूरा करें.
