आसमां पर टिकीं धरती पुत्र की निगाहें
नहरों में पानी के अभाव से प्रखंड की खेती बाधित
डुमरांव : रोहिणी नक्षत्र में कमजोर मॉनसून ने इलाके के किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है. लगातार बढ़ रही सूर्य की तपिश व गरमी के कारण खेतों में धान के बिचड़े डालने की प्रक्रिया बाधित हो गयी है.
नक्षत्र के लाभ को लेकर किसानों ने जैसे-तैसे डीजल से पटवन कर खेतों में बिचड़ा डालने का काम पूरा किया, लेकिन जब रोपनी की बारी आयी, तो इलाके की नहरें सूखी रह गयीं.
किसान पंप के सहारे पटवन कर रोपनी किये. प्रखंड में महंगी सिंचाई और खेती की लागत बढ़ने से किसानों की हालत बदतर हो गयी है. आज भी किसानों की निगाहें आसमां पर टिकी है. सरकारी से मदद मिली पर यह मदद भी सभी किसानों को नसीब नहीं बना पाया. इस बार भी मॉनसून के कमजोर होने को लेकर किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच गयी हैं.
खेतों में पड़ रही दरार : भोजपुर रजवाहा व डुमरांव रजवाहा की नहरों में पानी का अभाव बना है़ नहर विभाग ने कागज पर भले ही पानी छोड़ दिया हो, लेकिन नहरों का पेट पूरी तहर खाली है.
ऐसी स्थिति में किसानों के समक्ष मुश्किलें खड़ी हो गयीं हैं. पानी के बगैर खेतों में दरारें पड़ने लगीं हैं. इलाके के सिकरौल, बसुधर, केसठ, भखवां, महदह, मुकुंदपुर रजवाहों में भी कम बारिश के कारण यह नहरें दगा दे दी हैं.
किसान मुन्ना सिंह, राम बदन सिंह, विश्वनाथ चौधरी व शिवनाथ महतो कहते हैं कि इलाके के करीब 95 फीसदी खेतों में किसानों अपने बूते रोपनी का कार्य कर लिया है, लेकिन पानी के अभाव में अब खेतों में दरार पड़ना शुरू हो गया है.
क्या कहते हैं कृषि वैज्ञानिक
मॉनसून के कमजोर होने के बाद किसान अपनी खेतों में पानी के लिये जद्दोजहद कर रहे हैं. इस बाबत कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर रेयाज अहमद की मानें, तो किसानों को अब मध्यम व कम अवधि में तैयार होनेवाले फसल की खेती करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि जिस इलाके में पानी की कमी हो, वहां के किसान वैकल्पिक खेती से इसका मुकाबला कर सकते हैं.
अपनानी होगी ठोस नीति
प्रखंड इलाके की खेती मॉनसून पर आधारित है. जरूरत है प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने की. जल संग्रह से सिंचाई की दायरे बढ़ सकते हैं.
वहीं, पुराने तालाबों को अतिक्रमण से मुक्त कराना होगा और नया तालाब बनाना मॉनसून की स्थिरता से निबटने के यही कामयाब रास्ते हो सकते हैं.
सिंचाई का हाल
लक्ष्य-10 हजार 200 हेक्टेयर
सिंचाई-09 हजार 09 सौ 80 हेक्टेयर
