ओझा-गुनी के चक्कर में नहीं कराते पीड़ित ढंग का इलाज
विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रति हजार पर एक कुष्ठ रोगी के आंकड़े को जिले में धता बताते हुए कुष्ठ रोगियों की संख्या दो हजार से भी पार हो गयी है. जबकि आबादी के हिसाब से 18 सौ से अधिक कुष्ठ रोगी नहीं होना चाहिए. जागरूकता के अभाव में कुष्ठ रोगियों का इलाज जिले में नहीं हो रहा है और गांव-देहात में ईश्वरीय प्रकोप मान कर कुष्ठ रोगी अपंगता के शिकार हो रहे हैं. कुष्ठ रोग की नियमित दवा और जांच मुफ्त है और इसके इलाज से कुष्ठ रोगी पूरी तरह रोग मुक्त हो सकते हैं.
बक्सर : विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रति एक हजार आबादी पर एक कुष्ठ रोगी के आंकड़े को बक्सर जिला पीछे छोड़ चुका है. आबादी 18 लाख के हिसाब से 18 सौ कुष्ठ रोगी न्यूनतम होने चाहिए, लेकिन बक्सर जिला में यह संख्या पुराने सर्वेक्षण के हिसाब से दो हजार के पार है.
नये सर्वेक्षण में कुष्ठ विभाग के अधिकारियों का अनुमान है कि संख्या डेढ़ गुनी से अधिक हो सकती है. जिले में जागरूकता का अभाव है और ईश्वरीय प्रकोप तथा ओझा गुनी के चक्कर में पड़ कर कुष्ठ रोगी इलाज नहीं कराते और बिना इलाज के रह जाते हैं. जबकि कुष्ठ रोग पूरी तरह ठीक होनेवाली बीमारी है और पहली खुराक के बाद से ही इस बीमारी के रोगी संक्रमण से काफी हद तक बच सकते हैं और नियमित दवा खाकर चंगा भी हो सकते हैं. कुष्ठ बीमारी माइक्रो वैक्टिरियम लैपरी से होता है, जो तांत्रिकाओं और त्वचा को प्रभावित करती है, जिसका इलाज न होने पर व्यक्ति अपंगता का शिकार होता है.
जाने क्या है कुष्ठ रोग : कुष्ठ रोग माइक्रोवैकटिरियम लैपरी नामक जीवाणु के शरीर में सक्रिय होने से होता है. यह शरीर के तंत्रिकाओं एवं त्वचा को प्रभावित करता है. प्रारंभिक अवस्था में इलाज संभव है. रोग के नजरअंदाज से अपंगता तक आ सकती है.
ये हैं इसके लक्षण : प्रारंभिक अवस्था में त्वचा पर धब्बा बनता है. धब्बा सामान्य शरीर के रंग से हल्का या लाली लिये होता है. इसको स्पर्श से पता नहीं चलता है. दाग पर सनसनी नहीं होती है. ऐसे लक्षण दिखते ही सबसे पहले मरीज को अस्पताल या सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर पहुंचना चाहिए. ऐसे मरीजों आशा कार्यकर्ता से मिल सकते हैं, जिसके सहायता से वे सरकारी अस्पताल पहुंच सकते हैं.
इस तरह होता है इनका इलाज : ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे मरीज आशा से भी संपर्क कर सकते हैं. कुष्ठ से पीड़ित लोगों को अस्पताल में फ्री में टेस्ट एवं फ्री में दवा दी जाती है. डब्लूएचओ के अनुसार दो तरह के कुष्ठ रोगी होते हैं.
पीबी स्टेज : यदि शरीर पर धब्बा पांच से ज्यादा उभर चुके हैं, तो ऐसे मरीज को बारह माह तक दवा दी जाती है.इस तरह फैलती है बीमारी : कुष्ठ रोग वंशानुगत रोग नहीं है और न ही यह रोग छुआ-छूत से फैलता है. बल्कि कुष्ठ से संक्रमित रोगी के पास जाने पर वह छींकता है या श्वसन के दौरान एक-दूसरे के संपर्क में आने से यह रोग फैलता है.
कुष्ठ के अनदेखी से होती है विकृति
ग्रामीण क्षेत्रों में कुष्ठ से होनेवाली शारीरिक विकृति को लोगों द्वारा कर्म की कमाई से जोड़ अंधविश्वास या अभिशाप मान कर इलाज नहीं कराया जाता है. कुष्ठ की बहुत सी विकृतियों को उपचार द्वारा रोकना संभव हो गया है. जब तंत्रिकाओं में दर्द, संवेदना में कमी, हाथ-पैर में कमजोरी भारीपन जैसे कोई तकलीफ है, तो उसे तुरंत स्वास्थ्य अधिकारी से मिलना चाहिए, जिससे ससमय निदान हो सके.
खुराक में गैप होने पर क्या करें : आम तौर पर एक बार जब कुष्ठ रोगी का निबंधन हो जाता है, तो गैप होने की स्थिति में भी उसे पुन: निबंधन नहीं कराना चाहिए. साथ ही रोगियों को दवा शुरू करने के साथ ही आवश्यक खुराक पूरी होने तक लेनी चाहिए. बावजूद बीच में गैप हो जाये, तो केंद्र द्वारा उसी निबंधन संख्या पर दवा दी जाती है.
क्या कहते हैं कुष्ठ रोग चिकित्सक
कुष्ठ रोग के वैक्टिरिया शरीर में बहुत धीमी गति से रोटेट करता है. यह मरीज के स्वास्थ्य पर भी निर्भर करता है. शरीर में इस वैक्टिरिया के फैलने में वर्षो लग जाता है. दवा में गैप होने पर दुबारा रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं होती है. अभी जिले में राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसमें रोगियों को ढूंढने, पंजीकृत कर मुफ्त जांच व औषधि प्रदान करना तथा समाज को कुष्ठ रोग के बारे में बताना है.
डॉ निर्मल झा, कुष्ठ रोग प्रभारी
