Nalanda News (अमर वर्मा): बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के विशेष निर्देश पर मंगलवार, 2 जून 2026 को राज्य भर में आम जनता की समस्याओं के ऑन-द-स्पॉट (त्वरित) निपटारे के लिए दूसरे “सहयोग शिविर” का महाअभियान चलाया गया था. सरकार की मंशा थी कि ग्रामीण इलाकों के लोगों को अपनी छोटी-बड़ी शिकायतों के लिए अनुमंडल या जिला मुख्यालय के चक्कर न काटने पड़ें.
इसी कड़ी में नालंदा जिले के गिरियक प्रखंड अंतर्गत चोरसुआ पंचायत सरकार भवन में भी भव्य सहयोग शिविर का आयोजन किया गया था. लेकिन धरातल पर स्थानीय ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों की भारी लापरवाही के कारण यह महत्वाकांक्षी शिविर महज एक ‘खानापूर्ति’ और ‘फोटो अपॉर्चुनिटी’ (तस्वीर खिंचवाने का साधन) बनकर रह गया, जिससे सुदूर ग्रामीण इलाकों से आए सैकड़ों फरियादियों में जिला प्रशासन के खिलाफ भारी आक्रोश व्याप्त है.
आधे घंटे का कागजी कोरम और अफसरों की रवानगी, शिविर में मची अफरा-तफरी
चश्मदीदों और स्थानीय ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार, तय समय पर गिरियक प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) और अंचल अधिकारी (CO) समेत विभिन्न विभागों के तकनीकी पदाधिकारी शिविर स्थल पर पहुंचे जरूर थे. लेकिन उनकी दिलचस्पी जनता की दुख-तकलीफ और फरियाद सुनने से ज्यादा सिर्फ अपनी सरकारी उपस्थिति दर्ज कराने में दिखी.
अधिकारियों ने शिविर में आते ही मात्र आधे घंटे के भीतर ही कुछ कागजी कोरम पूरा किया, सरकारी रिकॉर्ड के लिए तस्वीरें खिंचवाईं और वहां से चलते बने. जिम्मेदार अधिकारियों के इस गैर-जिम्मेदाराना और संवेदनहीन रवैये के कारण शिविर परिसर में अचानक अफरा-तफरी और असमंजस का माहौल बन गया.
जमीन और सात निश्चय की नाली-गली के पेंडिंग आवेदन लिए खड़े रह गए लोग
सहयोग शिविर के आयोजन की आधिकारिक खबर सुनकर चोरसुआ पंचायत सहित आस-पास के गांवों से बड़ी संख्या में गरीब, बुजुर्ग और महिलाएं अपनी जटिल समस्याओं के परमानेंट समाधान की आस लेकर चिलचिलाती धूप में पहुंचे थे. शिविर में काउंटर पर सबसे ज्यादा आवेदन:
- भूमि विवाद, जमीन की सरकारी नापी (अमीन पैमाइश).
- ऑनलाइन दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) और आपसी जमीनी विवाद के मामले.
- सात निश्चय योजना के तहत गांवों में अधूरी पड़ी नाली-गली का निर्माण और जलभराव की गंभीर समस्याएं शामिल थीं.
लाभुकों की भीड़ अभी अपनी बारी का इंतजार करने के लिए कतारों को सुव्यवस्थित कर ही रही थी कि अचानक बीडीओ-सीओ की गाड़ियां सायरन बजाती हुई वापस लौट गईं. इसके चलते सैकड़ों ग्रामीण अपने मुख्य आवेदन हाथों में लिए बेहद मायूस होकर वापस अपने घर लौटने को मजबूर हो गए.
जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है यह दिखावा, चिलचिलाती धूप में क्यों किया परेशान?
शिविर स्थल पर मौजूद आक्रोशित ग्रामीणों ने कहा कि मुख्यमंत्री की यह योजना निश्चित रूप से आम जनता के हित में है, लेकिन स्थानीय अफसरों का लापरवाह रवैया इसे पूरी तरह फ्लॉप (विफल) बना रहा है. ग्रामीणों ने भड़कते हुए कहा, “अगर अधिकारियों को केवल अपनी फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया या सरकारी ग्रुप्स में डालनी थी, तो हमें इस जानलेवा चिलचिलाती धूप में बुलाकर परेशान क्यों किया गया? यह सिर्फ सरकारी धन का दुरुपयोग और जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है.” मुख्यमंत्री के सख्त आदेशों के बाद भी नालंदा के गिरियक प्रखंड में इस तरह की घोर लापरवाही जिला प्रशासन की कार्यशैली पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है.
अधिकारियों के जाने के बाद मुखिया चंदन कुमार ने खुद लिए डिजिटल आवेदन
एक तरफ जहां सरकारी अधिकारी अपनी ड्यूटी से पल्ला झाड़ते नजर आए, वहीं दूसरी ओर चोरसुआ पंचायत के मुखिया चंदन कुमार ने सराहनीय मिसाल पेश की. अधिकारियों के जाने के बाद भी वे अकेले ही टेबल पर बैठकर देर शाम तक ग्रामीणों से आवेदन लेते रहे और कइयों की ऑनलाइन शिकायतें भी दर्ज करते देखे गए.
इस संबंध में पूछने पर मुखिया चंदन कुमार ने अधिकारियों का बचाव करते हुए बताया कि प्रखंड के सतौआ पंचायत में भी आज ही के दिन शिविर निर्धारित था एवं वर्तमान में चल रहे मलमास मेला में विशेष ड्यूटी लगे होने के कारण अधिकारियों को जल्दी प्रस्थान करना पड़ा. हालांकि उन्होंने ग्रामीणों को आश्वस्त किया कि पंचायत स्तर पर ऐसे सहयोग शिविर हमेशा आयोजित करवाकर जनसमस्याओं का शत-प्रतिशत निदान कराया जाएगा. फिलहाल, ठगे से महसूस कर रहे ग्रामीणों ने अब नालंदा के जिलाधिकारी (DM) से इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच करने और शिविर में जमा हुए सभी आवेदनों पर त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई करने की लिखित मांग की है.
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