Bihar Liquor Ban: बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर सियासत तेज हो गई है. इसी बीच मद्य निषेध विभाग के मंत्री मदन सहनी ने सरकार का रुख साफ कर दिया है. उन्होंने कहा कि बिहार में शराबबंदी कानून में कोई संशोधन नहीं होगा. कानून पहले भी लागू था और आगे भी लागू रहेगा.
मंत्री ने यह भी कहा कि अब बिहार में शराब पहुंचाने वाले विदेशी या दूसरे ब्रांड की कंपनियों पर भी कार्रवाई की जाएगी. उनके खिलाफ FIR दर्ज कराई जाएगी. मदन सहनी के मुताबिक, इसकी शुरुआत भी हो चुकी है.
शराबबंदी के 10 साल पूरे, सरकार ने गिनाए फायदे
बिहार में पूर्ण शराबबंदी को लागू हुए करीब 10 साल हो चुके हैं. 1 अप्रैल 2016 को तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने राज्य में शराबबंदी लागू की थी.
मदन सहनी ने कहा कि शराबबंदी का फैसला खासतौर पर महिलाओं को ध्यान में रखकर लिया गया था. उनका कहना है कि पहले कई लोग शराब पीकर घर लौटते थे और परिवार के सदस्यों को प्रताड़ित करते थे.
उन्होंने मजदूर वर्ग का भी जिक्र किया. मंत्री के मुताबिक, कई ऐसे परिवार थे जहां कमाई का बड़ा हिस्सा शराब में खर्च हो जाता था.
'500 रुपये कमाने वाला 250 रुपये नशे में खर्च कर देता था'
मदन सहनी ने शराबबंदी के असर को समझाते हुए कहा कि रोजाना 500 रुपये कमाने वाला व्यक्ति कभी-कभी अपनी कमाई का आधा हिस्सा नशे पर खर्च कर देता था. इसके बाद वह खाली हाथ घर लौटता था.
मंत्री का दावा है कि शराबबंदी के बाद ऐसी स्थिति में बदलाव आया है. लोगों की कमाई अब परिवार की जरूरतों पर खर्च हो रही है.
बिहार में शराब आई तो कंपनी पर भी दर्ज होगी FIR
मदन सहनी ने शराबबंदी कानून को लेकर सरकार की आगे की रणनीति भी बताई. उन्होंने कहा कि अगर किसी कंपनी का विदेशी ब्रांड बिहार में पहुंचता है तो संबंधित कंपनी के खिलाफ भी FIR की जाएगी. यानी सरकार अब सिर्फ शराब बेचने या सप्लाई करने वालों पर ही कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहती. शराब के ब्रांड और उससे जुड़ी कंपनी पर भी कानूनी कार्रवाई की तैयारी है.
NCAER की रिपोर्ट से फिर गरम हुई शराबबंदी पर बहस
मंत्री के बयान के बीच बिहार की शराबबंदी को लेकर बहस भी जारी है. हाल ही में NCAER की एक रिसर्च के बाद इस मुद्दे पर नए सिरे से चर्चा शुरू हुई.
रिसर्च में शराबबंदी के सामाजिक उद्देश्यों का भी अध्ययन किया गया. खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा और घरेलू हिंसा में कमी के दावे को आंकड़ों के आधार पर परखा गया.
रिसर्चर्स के मुताबिक, उपलब्ध आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं होता कि शराबबंदी के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराधों में अपेक्षित कमी आई. रिपोर्ट में कुछ श्रेणियों में ऐसे अपराधों की रिपोर्टिंग बढ़ने की बात भी कही गई है.
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NDA में भी शराबबंदी को लेकर अलग-अलग राय
शराबबंदी को लेकर सत्ता पक्ष के नेताओं के बीच भी अलग-अलग राय सामने आती रही है. जेडीयू शराबबंदी के पक्ष में मजबूती से खड़ी है. वहीं, जेडीयू विधायक अनंत सिंह कई बार शराबबंदी खत्म करने की मांग उठा चुके हैं. उनका तर्क है कि शराबबंदी के बाद दूसरे प्रकार के नशे बढ़ रहे हैं.
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी कानून के क्रियान्वयन पर सवाल उठाते रहे हैं. उनका कहना है कि कानून ठीक है, लेकिन इसे लागू करने में पुलिस और प्रशासन के स्तर पर समस्याएं हैं. वह गुजरात मॉडल की तर्ज पर नशाबंदी लागू करने की बात भी कह चुके हैं.
सरकार का दावा- शराबबंदी से बदला माहौल
दूसरी ओर, सरकार के कई नेता शराबबंदी को सामाजिक बदलाव से जोड़ते हैं. मंत्री शीला मंडल का कहना है कि शराबबंदी के बाद लोगों का ध्यान परिवार और बच्चों की पढ़ाई पर बढ़ा है. खासकर लड़कियों के लिए माहौल बेहतर होने का दावा किया गया है.
यानी शराबबंदी को लेकर सरकार के भीतर भी अलग-अलग तर्क सामने आते रहे हैं. हालांकि, मद्य निषेध विभाग के मंत्री मदन सहनी ने अब सरकार का रुख स्पष्ट कर दिया है कि शराबबंदी कानून में कोई बदलाव नहीं होने वाला है.
विपक्ष लगातार उठा रहा सवाल
शराबबंदी को लेकर विपक्ष सरकार पर लगातार निशाना साधता रहा है. जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर इसे लेकर सरकार पर तीखे हमले करते हैं. उनका आरोप है कि शराबबंदी के नाम पर अवैध शराब का कारोबार और भ्रष्टाचार बढ़ा है.
आरजेडी भी सरकार पर शराब की अवैध सप्लाई रोकने में नाकाम रहने का आरोप लगाती रही है. पार्टी नेताओं का दावा है कि बिहार में फोन के जरिए शराब की डिलीवरी तक हो रही है.
