आरा/पटना : जिंदगी में राह चलते कई बार आप जाने-अनजाने कइयों से मदद लेते और देते हैं, पर कुछ दिनों बाद भूल जाते हैं. पर कोई ऐसा भी है, जिसने अपनी मौत से दो लोगों की जिंदगी को रोशन करने का इंतजाम कर दिया है.
आरा के 17 साल के इंटरमीडिएट के छात्र की दो साल पहले दोनों किडनी खराब हो गयी थी. करीब दो साल जिंदगी से जूझने के बाद जब उसे लगने लगा कि अब वह इस दुनिया से जानेवाला है, तो उसने अपने पिता अनिल कुमार सिंह से यह इच्छा जाहिर की कि मरने के बाद उसकी आंखें दान में दे दी जाएं, ताकि मरने के बाद भी वह किसी की दुनिया की रोशनी बन सके. शुक्रवार को आइजीआइएमएस में अनिमेष का निधन हो गया, जिसके बाद उसके माता-पिता ने उसकी इच्छा के अनुसार उसका नेत्रदान कराया. पिता अनिल ने आइजीआइएमएस के आइ डोनेशन बैंक में अपने बेटे की आंखें दान कीं. इसके बाद अस्पताल प्रशासन द्वारा परिवार को प्रशंसा पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया. विभाग के इंचार्ज डॉ निलेश मोहन और सहयोगी डॉक्टरों ने यह ऑपरेशन किया. अस्पताल के आंख विभाग के एचओडी डॉ विभूति नारायण ने बताया कि अनिमेष की आंखों से दो मरीजों को रोशनी मिल सकती है.
दूसरों की आंख से 104 देख रहे दुनिया : 21 अक्तूबर, 2014 को तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के हाथों आइ बैंक का उद्घाटन किया गया, तब से अब तक 120 लोगों ने अपनी आंख दान की हैं. दान की गयी आंखें 104 लोगों को कॉर्निया ट्रांसप्लांट करने के बाद रोशनी दे चुकी हैं. इसके अलावा 710 लोगों ने मृत्युपरांत नेत्रदान के लिए शपथ पत्र भर रखे हैं.
अब भी देख सकेगा मेरा बेटा
अनिमेष के पिता अनिल कुमार सिंह ने बताया कि उसकी दोनों किडनी खराब हो गयी थी. पिछले दो साल से वह डायलिसिस पर था. नेत्रदान करने के प्रति हम लोगों का परिवार जागरूक है. मेरा बेटा हम लोगों के बीच जिंदा रहे और उसकी यादें सदा बनी रहे, इसलिए हमने उसकी आंखों काे दान कर दिया. यह उसकी हार्दिक इच्छा थी. उनका कहना था कि बेटे की आंख नेत्रदान के बाद जब दूसरे लोगों को ट्रांसप्लांट की जायेंगी, तो हम लोगों को महसूस होगा कि मेरा बेटा अब भी इस संसार में जिंदा है और वे अपनी आंखों से हमारे परिवार और इस संसार को देख रहा है.
नेत्रदान के प्रति लोगों में आने लगी है जागरूकता
17 साल के अनिमेष का सफलता पूर्वक कॉर्निया निकाली गयीं. इससे दो लोगों को बड़े ही आसानी से रोशनी मिल जायेगी. आइजीआइएमएस में कुल 120 आइ ट्रांसप्लांट किये जा चुके हैं. लोगों में जागरूकता आने लगी है. इससे करीब 104 जिंदगी को रोशनी अब तक मिल चुकी है.
डॉ विभूति नारायण सिन्हा, एचओडी, नेत्र विभाग, आइजीआइएमएस
