सिल्क सिटी भागलपुर के पश्चिमी क्षेत्र स्थित ऐतिहासिक और पौराणिक परबत्ती में आगामी 13 जुलाई (सोमवार) को भक्ति और शक्ति का एक अनूठा संगम देखने को मिलेगा. आषाढ़ अमावस्या के पावन अवसर पर प्रसिद्ध 'बुढ़िया काली महारानी मंदिर' परिसर में विशेष पूजन, भव्य दीपोत्सव और बनारस की तर्ज पर महाआरती का भव्य आयोजन होने जा रहा है, जिसे लेकर स्थानीय वासियों और भक्तों में भारी उत्साह है.
बनारस की तर्ज पर महाआरती और महाभंडारे का आयोजन
आयोजन समिति के अध्यक्ष संतोष यादव ने बताया कि 13 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या के विशेष योग पर सुबह से ही वैदिक विधि-विधान और तांत्रिक पद्धति से मां काली का विशेष पूजन शुरू होगा:
- भव्य महाआरती: संध्या काल में बनारस (काशी) के गंगा घाटों की तर्ज पर प्रकांड पंडितों द्वारा विशेष मंत्रोच्चार के बीच मां की महाआरती उतारी जाएगी, जो श्रद्धालुओं के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र होगी.
- भक्तों के लिए महाभंडारा: बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय भक्तों की भारी भीड़ को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर में एक विशाल महाभंडारे (प्रसाद वितरण) की व्यवस्था की गई है.
बिहार और झारखंड के इन जिलों से श्रद्धालुओं का होगा जुटान
मां बुढ़िया काली का प्रताप और उनकी महिमा दूर-दूर तक फैली हुई है, जिसके कारण इस वार्षिक अनुष्ठान में अंतरराज्यीय श्रद्धालुओं का आगमन होता है:
- बिहार के जिले: भागलपुर के अलावा मुंगेर, जमुई, लखीसराय, खगड़िया और बांका जिलों से सैकड़ों परिवार इस पूजा में शामिल होने आ रहे हैं.
- झारखंड से जुड़ाव: पड़ोसी राज्य झारखंड के गोड्डा, साहेबगंज और दुमका जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचेंगे.
आयोजन समिति के सदस्य संभाल रहे कमान
इस बड़े धार्मिक समागम को अनुशासित और भव्य बनाने के लिए समिति के पदाधिकारी दिन-रात जुटे हुए हैं. आयोजन की सफलता में अध्यक्ष संतोष यादव, कोषाध्यक्ष ललन मंडल, सचिव राजा मंडल, मुख्य पुजारी काली चरण मंडल, उपाध्यक्ष रणवीर यादव, महामंत्री धनंजय यादव, रविकान्त चौधरी और रौशन मंडल सहित दर्जनों स्वयंसेवक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.
परबत्ती बुढ़िया काली मां की महिमा: आकाशीय बिजली भी नहीं डिगा सकी थी आस्था
भागलपुर के परबत्ती इलाके में स्थित यह मंदिर एक अत्यंत प्राचीन और सिद्ध शक्तिपीठ माना जाता है, जिससे कई अलौकिक इतिहास जुड़े हैं:
- आकाशीय बिजली का चमत्कार: स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, लगभग 30 साल पहले मंदिर परिसर में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और विशाल बरगद के पेड़ पर आकाशीय बिजली (गाज) गिरी थी. उस भीषण हादसे में पेड़ पूरी तरह बिखर और झुलस गया था. लेकिन मां काली की असीम कृपा से वह चमत्कारी पेड़ नष्ट नहीं हुआ और देखते ही देखते कुछ ही समय में दोबारा पूरी तरह हरा-भरा हो गया, जो आज भी मौजूद है.
- खुले आसमान के नीचे विराजती हैं माता: इस सिद्धपीठ की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक विशेषता यह है कि मां काली की मुख्य प्रतिमा कभी भी किसी बंद गर्भगृह या छत के नीचे नहीं रखी जाती, बल्कि वे खुले आसमान के नीचे ही विराजती हैं. लोक मान्यताओं के अनुसार, स्वयं माता के स्वप्नादेश के कारण ही उनकी प्रतिमा के ऊपर छत का निर्माण नहीं किया जाता है.
- 18 से 22 फीट की विशाल प्रतिमा: हर वर्ष यहां पुश्तैनी मूर्तिकारों द्वारा मिट्टी से 18 से 22 फीट की अत्यंत भव्य और विशालकाय प्रतिमा का निर्माण किया जाता है. पूरे भागलपुर की विसर्जन शोभायात्रा में परबत्ती की बुढ़िया काली की प्रतिमा को सबसे आगे (अगुआई) रखने की ऐतिहासिक परंपरा है.
आमतौर पर यहां प्रतिदिन भक्तों की कतारें लगती हैं, लेकिन सप्ताह के प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को मां के दरबार में विशेष पूजा-अर्चना का विधान है, जहां मन्नतें मांगने वाले श्रद्धालुओं की झोली कभी खाली नहीं रहती.
