अंग की धरती भागलपुर का भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक बेहद खास और गौरवशाली इतिहास रहा है. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपने जीवनकाल में कुल चार बार भागलपुर पधारे थे और उनकी हर यात्रा ने इस क्षेत्र में आजादी की लड़ाई को एक नई दिशा दी. टिल्हा कोठी (वर्तमान रवींद्र भवन) की प्राचीर से गूंजी उनकी आवाज हो या लाजपत पार्क का छात्र सम्मेलन, बापू की सादगी और उनके विचारों ने यहां के लोगों में राष्ट्रप्रेम की जो अलख जगाई, वह आज भी भागलपुर की फिजाओं में महसूस की जाती है.
पहली यात्रा (1917): हिंदी की शर्त और लाजपत पार्क में छात्र सम्मेलन
वरिष्ठ पत्रकार दिवंगत मुकुटधारी अग्रवाल की पुस्तक 'इंद्रधनुष' के संस्मरणों के अनुसार, गांधी जी पहली बार 15 अक्टूबर 1917 को भागलपुर आए थे:
- हिंदी भाषा पर जोर: उन्हें प्रदेश छात्र सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया था. बापू ने आयोजकों के सामने शर्त रखी थी कि यह पूरा कार्यक्रम सिर्फ 'हिंदी' में ही होगा, जिसे सहर्ष स्वीकार कर लिया गया.
- काठियावाड़ी वेशभूषा: गांधी जी इस सम्मेलन में अपनी पारंपरिक काठियावाड़ी वेशभूषा (पगड़ी, खादी कुर्ता, खादी धोती और काठियावाड़ी जूते) में पहुंचे थे.
- लाजपत पार्क का इतिहास: आज का प्रसिद्ध लाजपत पार्क मैदान कभी कांग्रेसी नेता दीपनारायण सिंह की जमीन हुआ करती थी, जिसे उन्होंने भागलपुर नगर पालिका को सौंप दिया था. इसी ऐतिहासिक मैदान में वह छात्र सम्मेलन आयोजित हुआ था.
दूसरी यात्रा (1920): टिल्हा कोठी से फूंका आजादी का बिगुल
12 दिसंबर 1920 को महात्मा गांधी अपनी दूसरी यात्रा पर भागलपुर पहुंचे. इस बार उनके साथ कांग्रेस के बड़े नेता शौकत अली भी थे:
- थर्ड क्लास बोगी में सफर: बापू ट्रेन के थर्ड क्लास डब्बे में बैठकर भागलपुर स्टेशन पहुंचे, जहां हजारों की भीड़ ने गाजे-बाजे के साथ उनका भव्य स्वागत किया.
- दीपनारायण सिंह बने मेजबान: इस यात्रा में वे दीपनारायण सिंह के आवास पर ठहरे थे.
- ऐतिहासिक आमसभा: गांधी जी ने टिल्हा कोठी (आज का रवींद्र भवन) पहुंचकर एक विशाल आमसभा को संबोधित किया और यहीं से भागलपुर में आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंका.
तीसरी यात्रा (1925): जब भागलपुर में मनाया अपना जन्मदिन
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. मनोज कुमार के अनुसार, बापू ने अपनी तीसरी यात्रा के दौरान भागलपुर में ही अपना जन्मदिन मनाया था:
- 1 और 2 अक्टूबर का प्रवास: गांधी जी 1 और 2 अक्टूबर 1925 को भागलपुर में थे. इसी दौरान 2 अक्टूबर को उनका जन्मदिन बेहद सादगीपूर्ण तरीके से मनाया गया.
- अग्रवाल सभा का उद्घाटन: अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने 'बिहार प्रांतीय अग्रवाल सभा' का विधिवत उद्घाटन भी किया था.
चौथी यात्रा (1934): भूकंप पीड़ितों का दर्द बांटने पहुंचे थे बापू
गांधीवादी कार्यकर्ता डॉ. मनोज मीता ने बताया कि जब 1934 में बिहार में प्रलयकारी भूकंप आया था, तब लाखों लोग बेघर हो गए थे:
- पीड़ितों की सेवा: बापू ने भूकंप पीड़ितों की पीड़ा को अपनी आंखों से देखने और कांग्रेस के राहत कार्यों की समीक्षा का फैसला किया.
- सीमांत गांधी थे साथ: उत्तरी बिहार का दौरा करने के बाद 2 अप्रैल 1934 को सहरसा होते हुए गांधी जी बिहपुर पहुंचे और गंगा पार कर भागलपुर आए. इस दौरान उनके साथ 'सीमांत गांधी' के नाम से मशहूर अब्दुल गफ्फार खान भी मौजूद थे.
