Bhagalpur. तीन युगों का साक्षी बटेश्वर धाम, गुप्तकाशी में शिव के सम्मुख विराजती हैं मां काली

जनश्रुतियों के अनुसार त्रेतायुग में भगवान श्री राम के कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ गंगा के तट पर भ्रमण करते हुए इस धरा धाम पर पहुंचे. यहां उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर विराजित शिवलिंग की विधिवत आराधना की.तभी से यह वशिष्ठेश्वर महादेव कहलाए.

कहलगांव. ओरियप पंचायत के उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर महर्षि वशिष्ठ द्वारा आराधित बाबा बटेश्वर नाथ महादेव का मंदिर सिर्फ एक धाम नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं और धार्मिक चमत्कारों का जीवंत केंद्र है.

पौराणिक महत्व: जब काशी यहां बसने वाली थी

जनश्रुतियों के अनुसार त्रेतायुग में भगवान श्री राम के कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ गंगा के तट पर भ्रमण करते हुए इस धरा धाम पर पहुंचे. यहां उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर विराजित शिवलिंग की विधिवत आराधना की.तभी से यह वशिष्ठेश्वर महादेव कहलाए. मान्यता है कि देवताओं ने इस जगह को शिव की नगरी काशी के रूप में बसाने का निर्णय लिया था.लेकिन जब साधु-संतों ने जमीन की वैदिक रीति से जांच की तो महज सवा हाथ लगभग एक गज जमीन कम पड़ गई. इसी कारण यह स्थल काशी नहीं बन पाया और काशी को बनारस जाना पड़ा. और यह स्थल गुप्तकाशी के नाम से प्रसिद्ध हुआ.यह धरती ऋषि दुर्वासा और ऋषि कोहल की भी तपोभूमि रही है.ऋषि कोहल के नाम पर ही क्षेत्र का नाम कहलगांव पड़ा.

ऐतिहासिक महत्व: तंत्र विद्या से विक्रमशिला तक

प्राचीनकाल में यह तंत्र विद्या का सबसे बड़ा केंद्र था. देश- विदेश से तांत्रिक और साधक यहां सिद्धि प्राप्त करने आते थे. इसी सिद्ध भूमि की ऊर्जा और महत्व को देखकर पाल वंश के शासक राजा धर्मपाल ने मंदिर से 3 किलोमीटर दूर विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई. यहां न्याय, दर्शन और तंत्र विद्या की पढ़ाई होती थी.पहाड़ों में आज भी ऋषि-मुनियों के तपस्या स्थल मौजूद हैं, जिन्हें पुरातत्व विभाग ने सुरक्षित किया है. यह स्थल बताता है कि कैसे यहां धर्म और शिक्षा एक साथ फले-फूले है.

धार्मिक महत्व: अद्भुत संयोगों का धाम

बटेश्वर धाम की सबसे बड़ी धार्मिक विशेषता है कि पूरे भारत में यह इकलौता मंदिर है जहां महादेव के ठीक सामने माँ दक्षिणेश्वरी काली विराजमान हैं.यहां गंगा लगभग 17 किलोमीटर उत्तरायणी बहती है.मान्यता है कि यहां गंगा महादेव को पखारने के लिए स्वयं उत्तर दिशा में मुड़ जाती है. प्रधान तीर्थ पुरोहित आचार्य डॉ. शंकर झा ने बताया कि यह शिवलिंग स्वयंभू है.कई बार प्रातः काल मंदिर का पट्ट खुलते हीं महादेव के गण अदभुत नागों का जोड़ा एवं अकल्पनीय बिच्छू शिवलिंग पर मदमस्त होकर झूमते हुए दिखाई दिए है. श्रद्धालु मानते हैं कि बाबा बटेश्वरनाथ सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी करते हैं.

प्रातःकालीन पूजा: जब जागते हैं महादेव

ब्रह्ममुहूर्त में सुबह 4 बजे मंदिर के पट खुलते हैं. मंगल आरती के बाद गंगा जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत महाभिषेक होता है. बेलपत्र, धतूरा, आक, भस्म से श्रृंगार कर मिष्ठान्न का भोग लगता है. संध्या समय सात बजे से विशेष पूजन,श्रृंगार, भोग एवं शयन आरती के बाद मंदिर का पट्ट बंद हो जाता है. सावन सोमवार को बनारस के विद्वान पंडित मां गंगा की महा आरती करते हैं.कांवरिए यहां से जल लेकर बैद्यनाथ,बासुकीनाथ सहित बिहार झारखंड सीमावर्ती क्षेत्र के अन्य प्रमुख शिवालयों में जाते हैं.

सांस्कृतिक आंदोलन बना महोत्सव

केंद्रीय रेलवे रेल यात्री संघ के अध्यक्ष विष्णु खेतान की सक्रियता से यह धाम अब सांस्कृतिक आंदोलन का केंद्र बन गया है.पिछले दो दशकों से नववर्ष,महाशिवरात्रि व सावन महीने में यहां बिभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है.विष्णु खेतान बताते हैं, “यहां धार्मिक पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं. बाबा बटेश्वर नाथ महादेव भक्तों की सभी मनोकामना पूरी करते हैं. “

विकास की नई राह

जिला मुख्यालय से लगभग 40 किमी दूर स्थित यह धाम अब सिर्फ बिहार नहीं, बल्कि देश विदेश के सैलानियों को आकर्षित कर रहा है.राज्य सरकार अब बटेश्वर धाम, विक्रमशिला और तीनपहाड़ को जोड़कर टूरिज्म सर्किट बनाने की तैयारी कर रही है. व्यू पॉइंट, सड़क सेवा शुरू होने से देश विदेश के सैलानी यहां पहुंचेंगे.आवश्यकता है स्थानीय प्रशासन मंदिर के सर्वांगीण विकास हेतु स्थायी समिति का गठन कर इस ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करे.

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लेखक के बारे में

By Brajesh nandan mad

ब्रजेश नंदन माधुर्य प्रिंट माध्यम में 20 वर्षों से और डिजिटल माध्यम में पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत दैनिक जागरण से की. अभी प्रभात खबर के भागलपुर कार्यालय में काम कर रहे हैं. स्वच्छता व ई-कॉमर्स में रुचि रखते हैं.

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