भागलपुर जिले के सुलतानगंज स्थित तिलकपुर की धरती ने देश को एक ऐसा लाल दिया, जिसके नाम से अंग्रेजी हुकूमत कांपती थी. 5 अक्टूबर 1905 को जन्मे बाबू सियाराम सिंह को उनके अदम्य साहस के कारण 'दूसरे वीर कुंवर सिंह' की उपाधि दी गई थी. साइमन कमीशन के बहिष्कार से लेकर असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि अंग्रेजों को उनकी गिरफ्तारी के लिए इनाम तक घोषित करना पड़ा. लेकिन यह बड़ी विडंबना है कि जिस महानायक ने अपना सब कुछ देश पर न्योछावर कर दिया, आज उसकी जन्मभूमि एक आदमकद प्रतिमा और उचित सम्मान की बाट जोह रही है.
'सियाराम दल' का गठन और अंग्रेजों को खुली चुनौती
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन ने जब पूरे देश में जोर पकड़ा, तब सियाराम बाबू ने बगावत को एक नई और आक्रामक दिशा देते हुए 'सियाराम दल' का गठन किया:
- जयप्रकाश नारायण का साथ: इस दल का मुख्य उद्देश्य लोकनायक जयप्रकाश नारायण के फौजी दस्ते को सहयोग देना और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ छापामार संघर्ष को तेज करना था.
- इनाम और चकमा: सियाराम दल की गतिविधियों से घबराकर ब्रिटिश प्रशासन ने उनकी गिरफ्तारी पर भारी इनाम घोषित कर दिया. इसके बावजूद, वे आजादी मिलने तक अंग्रेजी पुलिस की आंखों में धूल झोंकते रहे और जंगलों-पहाड़ों से छिपकर अपना आंदोलन चलाते रहे.
1931 का सोनवर्षा गोलीकांड और बड़े पद का त्याग
उनका संघर्ष केवल भागलपुर तक सीमित नहीं था. जनसहयोग के सहारे वे बिहार, असम, बंगाल, नेपाल, उत्तर प्रदेश और यहां तक कि मद्रास व हैदराबाद तक सक्रिय रहे:
- सोनवर्षा गोलीकांड: वर्ष 1931 में सियाराम बाबू के नेतृत्व में हुआ 'सोनवर्षा गोलीकांड' उनके लंबे और जुझारू संघर्ष की एक ऐतिहासिक कड़ी माना जाता है.
- कुर्सी से बड़ा देश: सियाराम बाबू केवल एक विद्रोही ही नहीं, बल्कि एक बेहद लोकप्रिय जननेता भी थे. 1938 में उन्होंने देश की आजादी को सर्वोपरि मानते हुए 'भागलपुर जिला डिस्ट्रिक्ट बोर्ड' के उपाध्यक्ष पद से बेहिचक इस्तीफा दे दिया था.
- भूकंप पीड़ितों की सेवा: 1934 के विनाशकारी भूकंप के समय उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद और दीपनारायण सिंह के साथ मिलकर मुंगेर और समस्तीपुर में पीड़ितों की भारी मदद की थी.
1975 में ली अंतिम सांस, आज भी अधूरी हैं मांगें
8 सितंबर 1975 को सियाराम बाबू ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. सियाराम सिंह स्मृति मंच के संयोजक और उनके पुत्र राजेंद्र प्रसाद सिंह बताते हैं कि स्वतंत्रता सेनानी के मरणोपरांत उनके सम्मान में आज तक एक उचित स्मारक नहीं बन सका है.
ग्रामीणों और स्मृति मंच की ओर से सरकार के समक्ष तीन प्रमुख मांगें रखी गई हैं:
- स्मारक और प्रतिमा: तिलकपुर में सियाराम बाबू की आदमकद प्रतिमा लगाई जाए और एक भव्य स्मारक व सामाजिक शोध संस्थान का निर्माण हो.
- नामकरण: निर्माणाधीन अगुवानी-सुलतानगंज गंगा पुल का नाम 'बाबू सियाराम सिंह पुल' और महेशी रेलवे स्टेशन का नाम 'बाबू सियाराम स्टेशन' रखा जाए.
- राजकीय सम्मान: उनकी जयंती व पुण्यतिथि राजकीय सम्मान के साथ मनाई जाए और उनके नाम पर डाक टिकट जारी हो.
आज जरूरत है कि सियाराम बाबू की शौर्य गाथा को सिर्फ भाषणों और फाइलों तक सीमित न रखकर, उसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अंग प्रदेश के इस वीर सपूत के अदम्य साहस और बलिदान को जान सकें.
