डाकुओं के अड्डे से शिक्षा के गढ़ तक... 30 साल में बदल गई गहिरी पंचायत की कहानी

जहां कभी डाकुओं के डर से लोग सहमे रहते थे, वहां आज बच्चों की पढ़ाई और भविष्य के सपने गूंज रहे हैं. गहिरी पंचायत में 1994 में शुरू हुआ शिक्षा अभियान झोपड़ी के स्कूल से बढ़ते हुए आज इंटर कॉलेज और डिग्री कॉलेज तक पहुंच चुका है.

गहिरी पंचायत का इतिहास: पश्चिम चंपारण के सीमावर्ती गहिरी पंचायत में कभी अपराधियों और डाकुओं का आतंक लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ता था. गांव के लोग भय के साये में जीते थे और बच्चों की शिक्षा दूर की बात लगती थी. ऐसे माहौल में समाजसेवी विभूति नारायण राय ने एक सपना देखा. डाकुओं के अड्डे माने जाने वाले इस इलाके में शिक्षा का दीप जलाने का सपना. पिता स्वर्गीय राजदेव राय की प्रेरणा से उन्होंने यह मिशन शुरू किया और तीन दशकों में इलाके की तस्वीर बदलने का प्रयास किया.

आज उसी क्षेत्र में स्कूलों और कॉलेजों के भवन खड़े हैं. दूर-दराज के गांवों के बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं और उच्च शिक्षा के लिए उन्हें हर बार शहर की ओर पलायन नहीं करना पड़ता.

1994 में गांव-गांव बैठकों से शुरू हुआ शिक्षा अभियान

विभूति नारायण राय ने वर्ष 1994 में गहिरी पंचायत के गांवों में बैठकें शुरू कीं. उस समय लोगों को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक करना आसान नहीं था. क्षेत्र की सामाजिक परिस्थितियां और अपराध का डर बड़ी चुनौती थे. इसके बावजूद उन्होंने ग्रामीणों से लगातार संवाद किया और बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया.

शुरुआत में झोपड़ीनुमा स्कूलों में बच्चों को पढ़ाया जाने लगा. समाजसेवी और वर्तमान मुखिया अनुपलाल यादव तथा उनके चचेरे भाई उमाशंकर राय ने भी इस प्रयास में सहयोग किया. धीरे-धीरे ग्रामीणों का भरोसा बढ़ा और शिक्षा के प्रति जागरूकता आने लगी.

सरस्वती ज्ञान निकेतन से बदली शिक्षा की तस्वीर

शिक्षा अभियान को आगे बढ़ाते हुए सरस्वती ज्ञान निकेतन विद्यालय की शुरुआत हुई. यहां आसपास और सुदूर क्षेत्रों के बच्चों को पढ़ाया जाने लगा. वर्ष 2000 तक पहली से आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई शुरू हो चुकी थी. बच्चों की पढ़ाई में बढ़ती रुचि देखकर अभिभावक भी बड़ी संख्या में उन्हें विद्यालय भेजने लगे.

इसके बाद वर्ष 2003 में मांडल उच्च विद्यालय की स्थापना की गई. हालांकि उच्चतर शिक्षा के लिए छात्रों को तब भी 22 किलोमीटर दूर बेतिया या 13 किलोमीटर दूर नौतन जाना पड़ता था.

इंटर कॉलेज से मिली आगे की पढ़ाई की राह

वर्ष 2006 में विभूति नारायण राय ने भारतीय इंटर कॉलेज की स्थापना की. वर्ष 2008 में कॉलेज को अनुमति मिलने के बाद क्षेत्र के विद्यार्थियों को आगे की पढ़ाई में काफी सहूलियत मिली. ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए उन्होंने मिशन की तरह काम जारी रखा.

संस्थान को आगे बढ़ाने में जनप्रतिनिधियों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों का भी सहयोग मिला. धीरे-धीरे झोपड़ी से शुरू हुआ यह शिक्षा अभियान विशाल विद्यालय भवनों तक पहुंच गया.

बिहार टॉपर बनी छात्रा अंशु कुमारी

झोपड़ी की जगह बना गहिरी कालेज का भवन | Prabhat Khabar Network

गहिरी क्षेत्र में शिक्षा की बदलती तस्वीर का एक बड़ा उदाहरण यहां की छात्रा अंशु कुमारी भी बनीं, जिन्होंने मैट्रिक परीक्षा में बिहार टॉपर बनकर विद्यालय और पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया. यह उपलब्धि उन ग्रामीण बच्चों के लिए प्रेरणा बनी, जो कभी बेहतर शिक्षा के लिए संसाधनों की कमी से जूझते थे.

उच्च शिक्षा को गांव के करीब पहुंचाने के लिए विभूति नारायण राय और उमाशंकर राय के संयुक्त प्रयास से वर्ष 2015 में तेलुआ गांव में बाबा भागवत राय डिग्री कॉलेज की स्थापना की गई. अब क्षेत्र के विद्यार्थियों को स्नातक की पढ़ाई के लिए शहर या बाहर जाने की जरूरत पहले की तुलना में कम हुई है.

इसी गांव से निकले IAS और IPS

विभूति नारायण राय का कहना है कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को पढ़ाकर उन्हें सुकून मिलता है. जब पुराने छात्र आदर के साथ आशीर्वाद लेने आते हैं, तो उन्हें अपने वर्षों की मेहनत सफल लगती है.

उन्होंने कहा कि उनका एक ही सपना है कि उनके संस्थानों से पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं एक दिन IAS और IPS बनें. जिस दिन किसी सुदूर गांव के बच्चे को देश की बड़ी प्रशासनिक सेवा में पहुंचते देखेंगे, उस दिन उनका यह शिक्षा मिशन और सपना दोनों साकार हो जाएगा.

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लेखक के बारे में

By राजकुमार पासवान

राजकुमार पासवान वर्ष 2001 से पश्चिम चंपारण के नौतन प्रखंड में सक्रिय पत्रकारिता कर रहे हैं. इन्होंने दस्यु सरगनाओं के आतंक, कानून-व्यवस्था और सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर अपनी अलग पहचान बनाई. वर्तमान में वे प्रभात खबर से संवाददाता के रूप में जुड़े हैं.

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