मंदार की पहाड़ियों और जंगलों के बीच मौजूद एक प्राचीन शिव मंदिर अपने गर्भ में 1857 की क्रांति से जुड़ी ऐसी कहानी समेटे है, जिसका उल्लेख करीब 131 साल पुराने सरकारी सर्वे में भी मिलता है. बांका के पिपरा नाथ मंदिर को लेकर स्थानीय परंपराएं बताती हैं कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह करने वाले सैनिक यहां पहुंचे थे. दिलचस्प बात यह है कि 1895 में बंगाल सरकार के सर्वे में भी इस मंदिर की पहचान दर्ज की गयी थी. आखिर पिपरा नाथ उस दौर में विद्रोहियों के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
1895 के सरकारी सर्वे में भी दर्ज था पिपरा नाथ
इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार बंगाल सरकार के पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट ने वर्ष 1895 में प्राचीन और पुरातात्विक धरोहरों का विस्तृत सर्वे कराया था. इस सर्वे में पिपरा गांव और पिपरा नाथ मंदिर का स्पष्ट उल्लेख मिलता है.
‘लिस्ट ऑफ एंसियंट मोनुमेंट्स ऑफ बंगाल’ में भागलपुर प्रभाग के नक्शे पर भी पिपरा नाथ को चिह्नित किया गया था. यह उल्लेख मंदिर के पुराने अस्तित्व और ऐतिहासिक पहचान को महत्वपूर्ण आधार देता है. हालांकि वर्ष 1810 में फ्रांसिस बुकानन के सर्वे में पिपरा नाथ का उल्लेख नहीं मिलता.
‘ढाकेर अरण्यो’ में भी मिलता है रहस्यमयी वर्णन
पिपरा नाथ का एक रोचक साहित्यिक संदर्भ भास्कर चट्टोपाध्याय की रचना ‘ढाकेर अरण्यो’ में मिलता है. इसमें मंदार के दक्षिणी जंगल से जुड़ा एक रहस्यमयी प्रसंग वर्णित है.
कथा के अनुसार आखेट से थका एक व्यक्ति विशाल पीपल के नीचे सो गया. नींद खुलने पर उसने जटाजूटधारी एक बलिष्ठ व्यक्ति को चीते को त्रिशूल के संधान से भगाते देखा. बाद में उसी स्थान के समीप एक मंदिर में जलता दीपक, शिवलिंग पर ताजे फूल और मिट्टी का कलश दिखाई दिया. आगे चलकर उसे बताया गया कि वह ‘चमत्कारों वाला मंदिर’ पिपरा नाथ है और वहां विप्लवी भी आते हैं.
1857 की क्रांति से जुड़ती है पिपरा नाथ की कड़ी
पिपरा नाथ की सबसे दिलचस्प कड़ी 1857 के विद्रोह से जुड़ी स्थानीय परंपराओं में दिखाई देती है. कहा जाता है कि बौंसी क्षेत्र में तैनात 32वीं देसी पैदल सैनिक के कुछ विद्रोही देवघर के रोहिणी में विद्रोह के बाद पिपरा नाथ पहुंचे थे. यहां पूजा-अर्चना करने के बाद वे आगे बढ़े और गिद्धौर के राजा को झुकने के लिए मजबूर किया.
इसके बाद विद्रोही सैनिक शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ते हुए कुंवर सिंह का साथ देने शाहाबाद की ओर गये. इस तरह पिपरा नाथ की कथा धार्मिक आस्था के साथ स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती इतिहास से भी जुड़ती है.
कभी जर्जर था मंदिर, अब श्रद्धालुओं की बढ़ी भीड़
1895 के सरकारी सर्वे में पिपरा नाथ मंदिर की स्थिति अच्छी नहीं बतायी गयी थी. सर्वे में यह भी उल्लेख था कि मंदिर स्थानीय जमींदार के संरक्षण में था और इसकी सेवा ब्राह्मणों द्वारा की जाती थी.
समय के साथ मंदिर की स्थिति में बदलाव आया और वर्तमान में यहां श्रद्धालु नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते हैं. खासकर श्रावण मास में मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.
आस्था, इतिहास और लोकविश्वास का अनोखा संगम
पिपरा नाथ की खासियत यही है कि यहां इतिहास केवल पुराने दस्तावेजों में नहीं मिलता, बल्कि स्थानीय मान्यताओं, साहित्य और धार्मिक परंपराओं में भी जीवित दिखाई देता है. 1895 का सरकारी सर्वे, साहित्यिक उल्लेख और 1857 के विद्रोह से जुड़ी कथाएं इस स्थल की ऐतिहासिक परतों को और गहरा करती हैं.
मंदार की ऐतिहासिक धरती पर स्थित पिपरा नाथ इसलिए महज एक प्राचीन शिव मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, पुरातत्व, साहित्य और स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों को अपने भीतर समेटे एक महत्वपूर्ण विरासत स्थल के रूप में सामने आता है.
