बांका : दीपावली यानी रोशनी का पर्व, बुराई का अंत, जीवन में आशा व प्रकाश का समायोजन से है. पंडित मनमोहन आचार्य विजय नगर बताते हैं कि पौराणिक कथा के अनुसार श्री राम चंद्र चौदह वर्ष के वनवास काट कर जब वापस लौटे तो अयोध्या नगरी में इनके स्वागत में पूरे अयोध्या नगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया था.
दीये की रोशनी की गयी थी. जिसका आध्यात्मिक अर्थ बुराई के अंधकार को मिटा कर अच्छाई का उजाला फैलाना था. पुरानी बात भुला कर नयी दुनिया में आजादी के साथ जीने का पैगाम देता है. सत्य की जीत को दरसाता है. मिट्टी के दीये में है शुद्धता दीपावली पर्व में उपयोग किये जाने वाले मिट्टी के दीये का विशेष महत्व है. इस संबंध में शहर के गणमान्य शिक्षक प्रकाश चंद्र यादव , योगेंद्र प्रसाद बताते हैं कि मिट्टी दीया का उपयोग शुद्धता को दरसाता है.
जबकि कृष्णापुरी निवासी चंद्रशेखर झा, शोभाकांत यादव का कहना है कि मिट्टी के दीये में भारतीय सभ्यता व संस्कृति दिखायी पड़ती है.चाईनीज बल्बों ने घटाई दीये की बिक्रीइस संबंध में दीया बनाने वाले करहरिया मुहल्ले के निवासी मैनेजर पंडित, अशोक पंडित कहते हैं कि आधुनिक युग में दीया की बिक्री घटती जा रही है.
बाजार में रंग बिरंगे चाईनीज बल्ब आ रहे हैं. लोग बनावटी के ओर रुख कर रहे हैं. ऐसे में हमलोगों के लिए मुसीबत है. रोजी रोजगार का एक यही मात्र सहारा है. अब उम्र के हिसाब से भी कुछ अलग नहीं कर सकता हूं.
