तिलडीहा दुर्गा मंदिर में बिहार ही नहीं अन्य राज्यों से आते हैं श्रद्धालु

तिलडीहा दुर्गा मंदिर में बिहार ही नहीं अन्य राज्यों से आते हैं श्रद्धालु फोटो 18 बांका 25, 26 : तिलडीहा दुर्गा मंदिर व पिंड की तसवीर. प्रतिनिधि, शंभुगंज अंग क्षेत्र के चर्चित और बिहार, बंगाल, झारखंड राज्य के श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है तिलडीहा. शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहां लगने वाले मेले में […]

तिलडीहा दुर्गा मंदिर में बिहार ही नहीं अन्य राज्यों से आते हैं श्रद्धालु फोटो 18 बांका 25, 26 : तिलडीहा दुर्गा मंदिर व पिंड की तसवीर. प्रतिनिधि, शंभुगंज अंग क्षेत्र के चर्चित और बिहार, बंगाल, झारखंड राज्य के श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है तिलडीहा. शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहां लगने वाले मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है. यह मेला बांका जिला के शंभुगंज प्रखंड अंतर्गत छत्रहार पंचायत क्षेत्र के बांका एवं मुंगेर जिला की सीमा पर बदुआ नदी के पूर्वी तट पर अवस्थित है. यह मंदिर सैकड़ों वर्ष पुराने कृष्ण काली, भगवती के एक ही पिंड पर स्थापित मंदिर जो लाखों श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र है. शारदीय नवरात्र के प्रथम पूजा से ही यहां हजारों हजार की संख्या में भक्त गण माता के दर्शन करने आते हैं. मंदिर के पूजारी आचार्य धनंजय शर्मा व आचार्य श्याम शर्मा ने बताया कि बंगाल राज्य के नदिया शांतिपुर जिले के दासपोसा गांव में हरिबल्लव दास एवं हरवल्लव दास नाम के दो भाई थे जो भगवती के पुजारी थे, दोनों भाई में घरेलू विवाद होने के कारण छोटा भाई हरवल्लब दास जो अविवाहित थे, भगवती माता से कह कर घर से निकल गये कि अब भगवती माता जहां कहोगी वहीं हम निवास करेंगे. मां भगवती ने आदेश दिया कि तुम आगे चलो मैं तुम्हारे पीछे आ रही हूं. हरवल्लव दास बंगाल से गंगा नदी के किनारे चलते-चलते सुलतानगंज गंगा किनारे पहुंच कर रूके. जहां मां भगवती ने स्वप्न दिया की अब गंगा किनारे आगे नहीं बढ़ो तब श्री दास ने सोचा की पूर्व से आया हूं और पश्चिम आगे नहीं जाना है और उत्तर में मां गंगा बह रही है और दक्षिण दिशा में ही एक रास्ता बचा है. जिस रास्ता से भगवान शंकर का बाबा धाम जाते हैं और श्री दास इसी रास्ते पर चल पड़े. चलते-चलते तारापुर के मोहनगंज गांव पहुंचे जहां पहले से ही बंगाल से आये बंगाली कायस्थ एवं ब्रह्माण बसे हैं एवं एक भगवती का मंदिर बना है फिर पड़ोस गांव धौनी गये जहां पूर्व से ही बंगाली कायस्थ बसे हैं एवं काली भगवती का मंदिर भी बना है, जबकि मां भगवती का आदेश था श्मशान घाट व नदी किनारे मेरा स्थापना करना तब हरवल्लब दास मोहनगंज गांव के पूर्व आगे बदुआ नदी के पूर्वी किनारे सिंघिया बाबा श्मशान घाट देखा जहां उस समय घने जंगल था जो सिद्धि के लिए उपयुक्त स्थान पाकर बैठ गये. उसी समय मां भगवती द्वारा आकाश मार्ग से मां भगवती का शंख, अर्घा, खड़ग, गिरा श्री दास द्वारा मोहनगंज गांव के प्रसिद्ध तांत्रिक बाबा आचार्य महेशानंद शर्मा को अपना पुरोहित बना कर 1603 ई में पूर्ण रूपेण तांत्रिक पद्धति से 108 नरमुंड पर मां भगवती के मंदिर का स्थापना किया. तब से आज तक इस मंदिर में कृष्ण, काली, दुर्गा की पूजा एक साथ पूर्ण रूपेण बंगला पद्धति से किया जाता है. श्री दास मोहनगंज में बंगाली कायस्थ घोष परिवार में अपना विवाह कर लिये. वर्तमान समय में भी श्री दास के वंशज ही मंदिर के मेढ़पति है और आचार्य महेशानंद शर्मा के ही वंशज मंदिर के पुजारी हैं. दसों दिन अलग-अलग पद्धति से होती है पूजा प्रथम पूजा 108 बेल पत्र से आहूति व पाठा की बलि, द्वितीय व तृतीय दिन पूजा के बाद चौथे पूजा को केले के वृक्ष को पान के पत्ते का माला पहना कर की जाति है एवं दो कोहरे खुवा का बलि दी जाती है. पांचवां पूजा को मां को पान खिलाया जाता है. षष्ठी की रात में केले के वृक्ष व दो जुड़वा बेल से तैयार मां स्वरूपा की शादी की रस्म अदा कर पिंड पर रखा जाता है. सात पूजा को कुमारा बालक द्वारा षष्ठी स्वरूप को बांस में टांगकर कलश के साथ लेकर बदुआ नदी में स्नान कराने के बाद पुन: बांस को पिंड पर रख दी जाती है. इसी दिन मां भगवती के प्रतिमा का श्रृंगार किया जाता है. फिर चक्षुदान मिट्टी के ढक्कन में मेढ़पति द्वारा तैयार काजल को शुद्ध घी में मिला कर कच्चु के डंटल से आंख की पुतली मेढ़पति परिवार द्वारा ही बनाया जाता है, इस वक्त मंदिर का पट बंद कर दिया जाता है. मंदिर के मुख्य द्वार के सामने दो काला पाठा रखा जाता है और मुख्य द्वार का दरवाजा खुलते ही मां भगवती का नजर पहले इसी पाठा पर पड़ता है. यहां पाठा बलि का पूराना परंपरा है. पहली पूजा एवं सप्तमी पूजा को मेढ़पति परिवार द्वारा पाठा बलि दिया जाता है. अष्ठमी और नवमी पूजा को आम श्रद्धालुओं का पाठा बलि होता है. यहां सप्तमी और अष्ठमी पूजा का अधिक महत्व है जो मेढ़पति परिवार द्वारा मंदिर का पट बंद कर किया जाता है. बलि के बाद दशमी को कुमारी कन्या को जमाया जाता है. जोनार में दही, चुड़ा और गुड़ खिलाने का प्रचलन है फिर प्रतिमा को चुमा कर देर रात बदुआ नदी में ही प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है. श्रद्धालुओं द्वारा मंदिर प्रांगण में अपने – अपने बच्चों का मुंडन भी कराया जाता है. फिर मेढ़ को नवमें दिन विधि विधान से पूजा कर वापस लाया जाता है. इस दिन भी श्रद्धालुओं द्वारा पाठा बलि दिया जाता है. यहां एक ही मेढ़ पर भगवती के साथ कृष्ण, काली, सरस्वती, गणेश, लक्ष्मी का प्रतिमा बनाया जाता है. भगवती का शंख, क र्घा और खड़गा प्राचीन काल का ही है. प्रतिमा का स्वरूप हर वर्ष एक ही आकृति का होता है. प्रतिमा का निर्माण कलाकार द्वारा किया जाता है, लेकिन प्रतिमा का सिर वाला भाग मेढ़पति परिवार द्वारा बनाया जाता है. मिट्टी का है पिंड समय के साथ-साथ मंदिर का स्वरूप बदला जा रहा है, लेकिन मंदिर का गर्भगृह एवं पिंड स्थल अभी भी मिट्टी का ही बना हुआ है. यहां शारदीय नवरात्र में बाहर से लाखों श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं तथा हजारों से ज्यादा पाठा की बलि दी जाती है. पूर्व में भैंसा बलि भी दी जाती थी, लेकिन प्रशासन द्वारा आम सहमति बना कर भैंसा बलि पर रोक लगा दी गयी. मेले की सुरक्षा बांका जिला प्रशासन द्वारा अपने क्षेत्र में किया जाता है तथा मुंगेर जिला में मुंगेर जिला प्रशासन द्वारा किया जाता है.

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