बांका : 1970 दशक के आसपास मासूम जुबां से गाया हुआ है, ना बोलो-बोलो गीत आपको याद होगा. पूर्णिमा श्रेष्ठ (सुषमा श्रेष्ठ) ने यह गीत गाकर बॉलीवुड में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करायी थी.
उन्होंने इस नाम से अंतिम गीत 1986 में फिल्म अंकुश में गाया है, इतनी शक्ति हमें दे ना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना. इसके बाद वह अपने बचपन की दुनिया से निकलने के लिए पूर्णिमा श्रेष्ठ नाम से मशहूर हो गयी. अपनी सुरीली आवाज से संगीत की दुनिया में दमदार प्रस्तुति देकर पार्श्व गायिका के रूप में मजबूत छाप छोड़ने वाली पूर्णिमा श्रेष्ठ ने बांका आगमन पर प्रभात खबर से विशेष बातचीत की. पुरानी यादों को साझा करते हुए उन्होंने वर्तमान पर दिल से प्रतिक्रिया दी.
एक सवाल पर उन्होंने बताया कि आज केवल गीत हैं, गीत में रूह नहीं बसती है. यद्यपि आज भी मेहनतकश कलाकार हैं, जो मूल संगीत की परंपराओं के साथ अपनी नयी राह बना रहे हैं. बांका के संदर्भ में उन्होंने बताया कि यहां हरदिल अजीज लोग बसते हैं. संगीत से बांकावासियों का अद्भुत जुड़ाव है, जो कलाकारों को उत्साह बढ़ाने में काम आता है. बताया कि उन्होंने अमेरिका, न्यूजीलैंड सहित दर्जनों अन्य देश में परफाॅर्मेंस दिया है.
-बांका को बताया हरदिल अजीज
पिता से मिली संगीत की प्रेरणा
नेपाल निवासी मशहूर पार्श्व गायिका पूर्णिमा श्रेष्ठ ने बताया कि उनके पिता भेला नाथ संगीतकार थे. उन्हीं से संगीत की दुनिया में कदम रखने की प्रेरणा मिली. जब वे 11 वर्ष की थी, तो उनके पिता इस दुनिया से गुजर गये.
ताज खां से गजल की तालीम
पूर्णिमा श्रेष्ठ ने ताज अहमद खां से गजल की तालीम ली. उन्होंने बताया कि गजल उनकी पसंदीदा गायिकी में शुमार है. वे गजलें भी बड़ी शिद्दत से गाती हैं. मंदार महोत्सव में उनका पहला गीत इतनी शक्ति हमें न दाता…रहेगा.
-पसंदीदा गीत : पार्श्व गायिका ने नवोदित गायक के रूप में हम किसी से कम नहीं फिल्म में क्या हुआ तेरा वादा…, मां फिल्म में बरसात में जब आयेगा सावन…उनकी पसंदीदा गीत में दर्ज हैें.
-किशोर दा के साथ सारे के सारे…: पार्श्व गायिका ने बताया कि पंचम दा के संगीतबद्ध में उन्होंने किशोर कुमार के साथ सारे के सारे गामा को लेकर…गीत गाया था. इसके बाद उस जमाने के दर्जनों सुप्रसिद्ध गायक व संगीतकार के साथ काम करने का उनको सौभाग्य प्राप्त हुआ.
