Aurangabad news : पति की दीर्घायु की कामना को लेकर 16 मई को सुहागन करेगी वट वृक्ष की पूजा
Aurangabad news: सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए आदर्श का प्रतीक है वट सावित्री व्रत
औरंगाबाद/कुटुंबा. सनातन संस्कृति में वट सावित्री व्रत का विशेष आध्यात्मिक और पारंपरिक महत्व माना जाता है. सौभाग्यवती महिलाएं संतान और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत करती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वट सावित्री व्रत प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि को विधि-विधान के साथ मनाया जाता है. देश के कई राज्यों में इस व्रत का अनुष्ठान तीन दिन पहले से शुरू होकर अमावस्या के दिन पूर्ण होता है. यह व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक माना जाता है. सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य, सुखी वैवाहिक जीवन और संतान सुख की कामना से वट सावित्री व्रत रखती है. डॉ हेरम्ब कुमार मिश्र ने बताया कि इस वर्ष 16 मई को वट सावित्री व्रत मनाया जायेगा. उन्होंने बताया कि उस दिन उदयकालिक अमावस्या तिथि रात एक बजकर 38 मिनट तक रहेगी. श्रद्धालु महिलाएं उपवास रखकर वटवृक्ष के नीचे विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करेंगी. पूजन के बाद बरगद के तने में लाल कच्चा धागा लपेटकर परिक्रमा करने की परंपरा है. मान्यता है कि वटवृक्ष के नीचे पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.
सदियों से होती रही है प्रकृति की पूजा
ज्योतिर्विद ने बताया कि सनातन धर्म में नदी, पहाड़ और वट जैसे वृक्षों की पूजा की परंपरा सदियों पुरानी है. लौकिक और वैदिक दोनों दृष्टिकोण से प्रकृति की पूजा को श्रेष्ठ माना गया है. पुराणों के अनुसार बरगद वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है. वृक्ष कार्बन डाईऑक्साइड ग्रहण कर प्राणवायु ऑक्सीजन प्रदान करते हैं. उन्होंने बताया कि इस व्रत से सावित्री और सत्यवान की कथा जुड़ी है. सत्यवान की मृत्यु निकट आने पर सावित्री ने तीन दिनों तक उपवास रखकर व्रत किया था. मृत्यु के दिन जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तब सावित्री उनके पीछे चल पड़ीं. अपने दृढ़ संकल्प और पातिव्रत्य धर्म से उन्होंने यमराज को प्रसन्न कर तीन वरदान प्राप्त किये. इसके प्रभाव से सत्यवान पुनर्जीवित हो गये, सास-ससुर को खोया हुआ राज्य मिला और सावित्री पुत्रवती हुईं.
बरगद का पौधा लगाने की अपील
अंबा क्षेत्र में वट सावित्री व्रत को लेकर महिलाओं में काफी उत्साह देखा जा रहा है. विभिन्न बाजारों में पूजा सामग्री, बांस के बेना और पंखों की खरीदारी शुरू हो गयी है. डॉ हेरम्ब कुमार मिश्र ने कहा कि पर्यावरण संतुलन और प्रकृति संरक्षण के लिए पेड़ों का होना अत्यंत जरूरी है. उन्होंने लोगों से पौधारोपण करने की अपील की. वहीं ढुंडा गांव के राधेकृष्ण पांडेय उर्फ गुडू पांडेय, रजनीश पांडेय और कंचन पांडेय ने बताया कि वट सावित्री पूजा के बाद महिलाओं को बरगद का पौधा लगाने का प्रयास करना चाहिए. यदि अभी मौसम अनुकूल नहीं हो तो वर्षा ऋतु में पौधारोपण किया जा सकता है. आचार्यों ने कहा कि इससे एक ओर जहां सुख-शांति और समृद्धि का संदेश मिलेगा, वहीं आने वाली पीढ़ियों को वट सावित्री व्रत के लिए बरगद के पेड़ की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा. उन्होंने बताया कि प्रखंड के कई गांवों में बरगद का पेड़ नहीं होने के कारण महिलाओं को पूजा के लिए दूसरे गांवों में जाना पड़ता है और भीड़ का सामना करना पड़ता है.